अंग्रेजों की कृषि (Agriculture) संबंधी नीति

अंग्रेज शासन से पूर्व भारत में उद्योग-व्यवस्था और कृषि दोनों में संतुलन था। अतः 18 वी. शता.में भारत कृषि प्रधान देश होते हुए भी संपन्न था। किन्तु अंग्रेज प्रशासकों ने ऐसी नीति अपनायी कि सिंचाई की अधिक सुविधाओं के बावजूद कृषि जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। इस परिवर्तित स्थिति के लिए अंग्रेजों की कृषि संबंधी नीति ही उत्तरदायी थी।

1793 में भूमि का स्थायी बंदोबस्त(Permanent settlement of land) किया गया। 19 वी. शता. के आरंभ तक इस बंदोबस्त के दोष प्रकट होने लगे अतः दो नई प्रणालियों -महलवाङी तथा रैय्यतवाङी प्रथा का विकास हुआ।

1801 में कंपनी ने अवध से जो क्षेत्र प्राप्त किये तथा 1803-4 में उत्तरी भारत में मराठों से जो क्षेत्र जीते, वहाँ महलवाङी प्रथा स्थापित की गई। इस प्रथा के अंतर्गत राजस्व व्यवस्था प्रत्येक महाल(फारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ जागीर अथवा गाँव होता है।) के साथ स्थापित की गई।

1801से 1803 के बीच अवध के प्रदेशों में लगान की दर 25 प्रतिशत तक बढा दी गई।1807-1818 के बीच लगान 50 प्रतिशत तक बढ गया।1818 में पहली बार महलवाङी प्रथा को व्यवस्थित रूप से लागू किया गया।इसके अनुसार गाँव के प्रधान के साथ समझौता किया गया। गाँव का प्रधान किसानों से लगान वसूल करके, प्राप्त हुए लगान का 83 प्रतिशत तक कंपनी के कोष में जमा करा देता था।

1833 में इस प्रथा को और अधिक व्यवस्थित किया गया। इसके अनुसार कुछ गाँवों को मिलाकर महाल(क्षेत्र) का निर्माण किया गया तथा उस महाल का लगान निश्चित कर दिया गया और फिर उस लगान को गांवों में विभाजित किया गया। इस समय भू-राजस्व की मांग इतनी अधिक थी कि आगे चलकर स्वयं सरकार को इसे कम करने के लिए विवश होना पङा।इस समय भू-राजस्व की मात्रा पैदावार का 2/3 निर्धारित की गई थी, लेकिन 1855 में लगान की मात्रा पैदावार का 1/2 कर दी गयी।

मद्रास में पहले जमीदारी प्रथा स्थापित करने का प्रयत्न किया गया,लेकिन वहाँ कुछ क्षेत्रों में जमींदार वर्ग था ही नहीं। 1800 ई. में बंगाल की तरह नीलामी व्यवस्था लागू की गई। किन्तु वह भी पूरी तरह सफल नहीं हुई। अतः वहाँ भी महलवाङी प्रथा स्थापित की गई।

किन्तु यह प्रथा वहाँ सफल नहीं हुई,क्योंकि गाँव का प्रधान, दूसरे किसानों का दायित्व अपने ऊपर लेने को तैयार नहीं था।अतः विवश होकर 1812 में वहाँ रैय्यतवाङी प्रथा स्थापित की गई।इसके अंतर्गत प्रत्येक किसान के साथ व्यक्तिगत रूप से समझौता करके राजस्व तय किया गया।

किसान को यह विकल्प दिया जाता था कि वह चाहे तो निर्धारित लगान देकर खेती करे अथवा खेती का कार्य छोङ दे। यह प्रथा किसानों के लिये हानिकारक सिद्ध हुई, क्योंकि प्रथम तो भू-राजस्व की मात्रा अत्यधिक थी और दूसरी, किसी वर्ष फसल खराब हो जाने पर लगान में छूट की संभावना न थी।

अधिकारी बङी निर्दयता से लगान वसूल करते थे। 1852-53 में ब्रिटिश संसद की जाँच समिति ने इसमें परिवर्तन के आदेश दिये, लेकिन उसका कोई परिणाम नहीं निकला। बंबई में भी भूमि की पैमाइश करवाई गई और कुछ फेरबदल कर रैय्यतवाङी प्रथा ही स्थापित की गई।वहाँ पर भी किसानों पर लगान का बोझ अत्यधिक रहा।

अंग्रेजों द्वारा स्थापित उपर्यक्त पद्धतियों के बङे विनाशकारी परिणाम हुए। प्रायः प्रत्येक व्यवस्था में लगान की मात्रा इतनी अधिक थी कि किसान उसे चुकाने में असमर्थ था। फलस्वरूप किसानों को साहूकारों से ऋण लेकर लगान चुकाना पङता था। साहूकारों ने ऋण की वसूली के लिए जमीन पर अपना अधिकार करना आरंभ कर दिया।

इस प्रकार स्वामित्व प्राप्त किसान भूमिहीन मजदूरों की श्रेणी में आ गया।जमींदारी प्रथा में भी किसानों का शोषण बढता रहा और किसान ऋणी होते गये।उधर कुटीर उद्योगों के विनाश तथा औद्योगीकरण के अभाव में लोग अपने जीविकोपार्जन हेतु कृषि की ओर झुके। अतः भूमि की माँग बढने लगी।

बढती हुई जनसंख्या के कारण भी कृषि पर अधिकाधिक भार बढता गया। किन्तु कृषि साधनों में नवीनता को न अपनाने से कृषि की उन्नति नहीं हो सकी।इसके अतिरिक्त संयुक्त परिवार प्रणाली टूटने लगी थी, जिससे भूमि का बंटवारा होने लगा।

फलस्वरूप किसानों के पास जो कुछ भी भूमि थी वह छोटे-2 टुकङों में विभक्त हो गयी।किन्तु कृषि उत्पादन के निर्यात में अवश्य वृद्धि हुई, लेकिन इससे किसनों को कोई लाभ नहीं हुआ।इतना ही नहीं इंग्लैण्ड की कृषि उत्पादन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अंग्रेजों ने विभिन्न क्षेत्रों में नई फसलें लगाने के आदेश दिये, जिससे कुछ क्षेत्र तो विशेष फसलों ने विभिन्न क्षेत्रों में नई फसलें लगाने के आदेश दिये, जिससे कुछ क्षेत्र तो विशेष फसलों के लिए प्रसिद्ध हो गये, जैसे पंजाब गेहूँ और रूई के लिए, बंबई रूई के लिए, बंगाल पटसन और नील के लिए, बिहार अफीम के लिए तथा आसाम चाय के लिए।

भारत से खाद्यान का निर्यात भी किया जाता था। 1876-78 में दक्षिण भारत में भयंकर अकाल पङा, फिर भी इस समय 69 लाख पौण्ड मूल्य का अनाज निर्यात किया गया और किसानों को आधे पेट रहकर गुजारा करना पङा।

प्रारंभ में अंग्रेजी प्रशासन में कृषि कोई अलग विभाग नहीं था। 1880 में अकाल आयोग की सिफारिशों पर विभिन्न प्रांतों में कृषि विभाग स्थापित किये गये। किन्तु कुछ ही वर्षों के बाद उन्हें समाप्त कर दिया गया। कई बार प्रायोगिक फार्म स्थापित करके वहां आधुनिक उपकरणों से खेती करने का प्रचार किया गया, किन्तु इन फार्मों के संचालक ऐसे लोग होते थे, जो भारत की परिस्थितियों से सर्वथा अनभिज्ञ होते थे। अतः ऐसे फार्मों की असफलता तो निश्चित ही थी। इसी प्रकार 1883 में भूमि सुधार विधेयक तथा 1884 में कृषक ऋण विधेयक पारित किये गये।

लेकिन इन विधेयकों को कार्यान्वित करने का दायित्व कलेक्टरों द्वारा किसानों को कम ब्याज पर ऋण देने की व्यवस्था की गई, ताकि उसे साहूकार या महाजन से अधिक ब्याज पर ऋण न लेना पङे।लेकिन किसानों को सरकार से समय पर ऋण मिलने की निश्चित आशा नहीं होती थी और यदि ऋण मिल भी जाता था तो ऋण की वसूली कठोरता से होती थी।

इसलिए किसान महाजन से ऋण लेना अधिक उपयोगी समझता था। 1899-1901 में भयंकर अकाल पङा। अतः 1901 में केन्द्रीय व प्रांतीय सरकारों को कृषि संबंधी परामर्श देने के लिए इन्सपेक्टर जनरल आफ एग्रीकल्चर नामक अधिकारी नियुक्त किया गया तथा एक इम्पीरियल कृषि विभाग स्थापित किया गया।

पूना में (1903) एक केन्द्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान की स्थापना की गई।1905 में भारत सरकार को कृषि संबंधी सुझाव देने के लिए अखिल भारतीय कृषि बोर्ड की स्थापना की गई। 1906 में इंडियन एग्रीकल्चर सर्विस का निर्माण किया गया।

कृषि विभाग को प्रोत्साहन देने के लिए कृषि कॉलेजों की स्थापना की गई। 1908 में पूना में कृषि कॉलेज की स्थापना की गई और कालांतर में ऐसे ही कॉलेज लायलपुर, नागपुर,कानपुर,कोयम्बटूर और मांडले में भी खोले गये।

1919 के अधिनियम में कृषि हस्तांतरित विषय बना दिया गया।किन्तु सिंचाई तथा कृषि अनुसंधान का उत्तरदायित्व भारत सरकार पर ही रहा। 1928 में कृषि के संबंध में लिनलिथगो कमीशन नियुक्त किया गया।

इसकी सिफारिशों के आधार पर 1929 में इंपीरियल कौंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च की स्थापना हुई, जिसका प्रमुख कार्य कृषि अनुसंधान को प्रोत्साहन देना था। 1935 में कृषि उपजों को बेचने के लिए एक केन्द्रीय मार्केटिंग विभाग स्थापित किया गया।

1937 में प्रांतों में उत्तरदायी सरकार स्थापित होने के बाद किसानों की रक्षा के लिए कानून पास किये गये, ताकि वे जमींदार व महाजन के चंगुल से बच सकें।

Reference : http://www.indiaolddays.com

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