ब्रिटिश काल में भारत की अर्थव्यवस्था (Economy)

भारत में कंपनी राज्य की स्थापना के पूर्व देश की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी। 1700 ई. में भारत की आर्थिक दशा का वर्णन करते हुए फ्रांसीसी यात्री बर्नियर (Barnier)ने लिखा था, यह भारत एक अथाह गुड्डा है, जिसमें संसार का अधिकांश सोना और चाँदी चारों तरफ से अनेक रास्तों से आकर जमा होता है। और जिसे बाहर निकालने का उसे एक भी रास्ता नहीं मिलता…….अपनी दो यात्राओं के दौरान में मैं बंगाल के संबंध में जो ज्ञान प्राप्त कर सका हूँ वह मुझे विश्वास दिलाता है कि यह मिस्त्र से भी अधिक धनी देश है।

किन्तु 1900 ई. में भारत की आर्थिक दशा का वर्णन करते हुए विलियम डिग्वी ने लिखा था, 20 वी. सदी. के आरंभ में लगभग दस करोङ व्यक्ति ब्रिटिश भारत में ऐसे हैं, जिन्हें किसी समय भी पेट भर अन्न नहीं मिल सकता…………इस अधःपतन की दूसरी मिसाल इस समय किन्हीं सभ्य या उन्नतिशील देशों में कहीं पर दिखाई नहीं दे सकती।

भारत में लूट का आरंभ

प्लासी के युद्ध के बाद भारत में अंग्रेजों की लूट आरंभ हो गयी। 1757 से 1760 के बीच मीरजाफर ने लगभग 3 करोङ रुपये रिश्वत के रूप में कंपनी व अंग्रेज अधिकारियों को दिये तथा अगले 8 वर्षों में अंग्रेजों ने 15 करोङ रुपये से अधिक का व्यापारिक लाभ उठाया। प्लासी के युद्ध के पूर्व भारत से माल खरीदने के लिए अंग्रेजों को इंग्लैण्ड से सोना और चाँदी लाना पङता था, लेकिन युद्ध के बाद यह सब बंद हो गया, क्योंकि अब भारत में ही इतना पर्याप्त धन मिल जाता था कि इंग्लैण्ड से मंगाने की आवश्यकता ही नहीं रही।

बंगाल से प्राप्त हुए धन से उन्होंने चीन के व्यापार में पूँजी लगा दी। क्लाइव के द्वैध शासन के अंतर्गत तो कंपनी के व्यापारी न केवल व्यापारी की तरह व्यापार करते थे, बल्कि संप्रभु की तरह कार्य करते थे तथा उन्होंने हजारों भारतीय व्यापारियों के मुँह की रोटी छीन ली और उन्हें भिखारी बना दिया।

भारतीय उद्योगों पर भी कंपनी ने प्रहार किया।बंगाल का मुख्य उद्योग कपङा उद्योग था, किन्तु कंपनी के गुमास्ते भारतीय जुलाहों को एक निश्चित समय में निश्चित प्रकार का कपङा बनाने को बाध्य करते थे और अपनी इच्छानुसार उसकी कीमत देते थे।

गुमास्तों की इच्छा पूरी न होने पर जुलाहों के अँगूठे काट दिये जाते थे। फलतः जुलाहों ने कपङा बुनना छोङ दिया। 18वी. शता.के उत्तरार्द्ध में बंगाल में रेशम उद्योग अत्यंत ही उन्नत था। किन्तु कंपनी ने इस उद्योग को हतोत्साहित किया, क्योंकि इंग्लैण्ड में रेशमी वस्त्र उद्योग उन्नति कर रहा था। अतः बंगाल में कच्चा रेशम बनाने वालों पर भीषण अत्याचार किये गये।उन्हें अपना उद्योग बंद कर अंग्रेज फैक्ट्री में काम करने को बाध्य किया। फलस्वरूप बंगाल में उद्योग प्रायः नष्ट होने लगा।

अंग्रेज कर्मचारियों का निजी व्यापार

कंपनी के कर्मचारी जिन उपायों से धन लूटते थे, उनमें दस्तक प्रथा मुख्य थी। दस्तक प्रमाण-पत्र था जो अंग्रेज फैक्ट्री का अध्यक्ष कंपनी के सामान के संबंध में देता था जिससे उस पर चुंगी नहीं लगती थी। कंपनी के कर्मचारी अपना निजी व्यापार करने लगे तथा निजी व्यापार में भी दस्तक का प्रयोग कर अपने माल को चुंगी से मुक्त करा लेते थे।

1752 के बाद व्यक्तिगत तथा कंपनी के सामान में भेद करना भी असंभव हो गया, जिससे बंगाल सरकार को हानि होने लगी। इससे भारतीय व्यापार भी चौपट होने लगा, क्योंकि भारतीय व्यापारियों को चुंगी देनी पङती थी।

धन का निष्कासन और उसका प्रभाव

अंग्रेजों की औद्योगिक नीति

अंग्रेजों की कृषि संबंधी नीति

अंग्रेजों की अकाल के प्रति नीति

रेल निर्माण कार्य

मुद्रा व्यवस्था तथा बैंक

Reference : http://www.indiaolddays.com

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