ब्रिटिश काल में रेल निर्माण कार्य

विश्व के विभिन्न देशों की आर्थिक प्रगति में रेलों का भारी योगदान था। यातायात की सुविधा के बिना भारी वस्तुओं का एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना तथा बङे पैमाने पर उत्पादित वस्तुओं का एक व्यापार संभव नहीं था।

यद्यपि विश्व में प्रथम रेल मार्ग(First railway route) 1830 में खुल गया था, लेकिन भारत में 1848 के पूर्व अंग्रेज( angrej ) प्रशासकों ने रेल निर्माण की योजना में रुचि नहीं ली।

डलहौजी(Dalhousie) को भारत में रेल निर्माण का श्रेय दिया जाता है।डलहौजी के बाद के गवर्नर-जनरलों ने भी रेल लाइनों का विकास किया, किन्तु भारत में रेल निर्माण का विकास होने के बावजूद इतना विकास नहीं हो सका, जितना जापान,कनाङा,आस्ट्रेलिया आदि देशों में रेलों के निर्माण के बाद हुआ था। इसके अंग्रेजी रेल नीति मुख्य रूप से उत्तरदायी थी।

सर्वप्रथम लार्ड हार्डिंग(Lord Harding) ने साम्राज्य की सुरक्षा के लिए, सेना को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने के लिए कंपनी के संचालकों को भारत में रेल निर्माण को प्रोत्साहन देने हेतु लिखा था।

रेलों के निर्माण से भारत से कच्चे माल का निर्यात बढ सकता था तथा इंग्लैण्ड में उत्पादित माल को बङी मात्रा में भारत भेजा जा सकता था। इस प्रकार रेलों का निर्माण, भारत की अर्थव्यवस्था को इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था के अधीन बनाये रखने का प्रयास मात्र था।

लार्ड डलहौजी द्वारा किया गया रेल निर्माण कार्य एक विशेष पद्धति पर आधारित था, जिसे गारंटी पद्धति कहा जाता था। इस पद्धति के अंतर्गत ब्रिटिश निजी कंपनियों को सरकारी देखरेख में रेल निर्माण का कार्य सौंपा गया । इन कंपनियों को उनकी पूँजी पर ब्याज और 4.50 प्रतिशत से 5 प्रतिशत लाभ की गारंटी दी गई।

यदि कभी निर्धारित लाभ से कम लाभ होता था तो सरकार की ओर से वह राशि पूरी की जाती थी। सरकार को 25-30 वर्ष बाद रेलों को खरीदने का अधिकार दिया गया।

इस गारंटी पद्धति के पक्ष व विपक्ष में तर्क दिये गये हैं। इसके पक्ष में मुख्य बात यह कही जाती है कि इस पद्धति द्वारा बिना कंपनी के कोष पर बोझ पङे रेल निर्माण कार्य चालू हो गया। यह भी कहा जाता है कि उस समय भारतीय पूँजी विनियोग के लिए उपलब्ध नहीं थी और ब्रिटिश पूँजी का विनियोग भारत में तब तक संभव नहीं था, जब तक कि पूँजी विनियोग करने वालों को उनकी पूँजी की गारंटी नहीं दे दी जाती।

लेकिन इस तर्क में कोई सत्यता प्रतीत नहीं होती, क्योंकि अमेरिका,कनाङा,आस्ट्रेलिया तथा यूरोप के अन्य देशों में अंग्रेज उद्योगपति बिना गारंटी के पूँजी विनियोग कर रहे थे, फिर ब्रिटिश साम्राज्य में अंग्रेजों को ही गारंटी देने की क्या आवश्यकता थी। वास्तविकता यह थी कि उस समय इंग्लैण्ड में अतिरिक्त पूँजी बहुत थी और अंग्रेज पूँजीपति विभिन्न देशों में विनियोग का अवसर ढूँढ रहे थे।

इस पद्धति द्वारा उन्हें लाभ कमाने का स्वर्ण अवसर मिल गया। फिर गारंटी मिल जाने पर किफायत से काम करने की भी आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि समस्त पूँजी पर लाभ की गारंटी थी। यह तथ्य इस बात से भी प्रगट होता है कि भारत में रेल निर्माण पर औसत खर्च 20 से 40 हजार पौंड प्रति मील आ रहा था जबकि इंग्लैण्ड में यह केवल 9,000 पौंड था।

इसके अतिरिक्त छोटे से छोटा पुर्जा भी इंग्लैण्ड से आयात किया जाता था। अतः रेल निर्माण योजना भारत से धन-निष्कासन का एक सहायक कारण बनी। रेलों में लगाई गई पूँजी तथा ब्याज भारत को लौटाना पङ रहा था, फिर भी रेल संपत्ति राष्ट्रीय संपत्ति में शामिल नहीं हो पाई।

अंग्रेज लेखकों ने भारत में रेलों का लाभ बताते हुए कहा कि इससे भारत का निर्यात व्यापार बढा, भारतीयों को नौकरी के अवसर उपलब्ध हुए और अकाल के समय वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में सुविधा हुई।

लेकिन निर्यात व्यापार बढने से लाभ केवल अंग्रेजों को हुआ।भारतीयों को नौकरी के अवसर अवश्य उपलब्ध हुए, लेकिन उसकी संख्या बहुत ही कम थी।

अंग्रेजों की प्रजातीय विभेद की नीति को देखते हुए इस प्रश्न का उत्तर भी सरलता से दिया जा सकता है। ब्रिटिश कंपनियों ने रेल निर्माण में मितव्ययता से काम नहीं किया, अतः कंपनियों को घाटा रहा, जिसे भारतीय राजस्व से पूरा किया गया।

1869 में इस गारंटी पद्धति को त्याग कर अंग्रेज सरकार ने स्वयं पूँजी उधार लेकर रेल निर्माण की नीति अपनाई। इस नीति के अंतर्गत राजपूताना,उत्तरी पंजाब और उत्तरी बंगाल में रेल लाइनें खोली गई। किन्तु 1876-77 के अकाल के कारण तथा द्वितीय अफगान युद्ध के कारण भारत की अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई।

अतःइस नीति का परित्याग कर पुनः पहले की अपेक्षा अधिक उदार शर्तों पर गारंटी पद्धति अपनाी गई।अंग्रेजी सरकार ने देशी रियासतों को अपने राज्य से रेल निर्माण के लिए प्रोत्साहित किया। अतः विभिन्न रियासतों की रेल लाइनें स्थापित हुई।

1905 में रेलों के सुप्रबंध के लिए रेलवे बोर्ड (Railway board)की स्थापना की गई। 1921 में एक्वर्थ कमीशन ने रेलों के विकास की एक योजना बनाई किन्तु सरकार ने इस कमीशन के सुझावों को अस्वीकार कर दिया।

रेल कंपनियाँ प्रतिवर्ष एक करोङ रुपया लाभ के रूप में इंग्लैण्ड ले जाती थी, किन्तु व्यापारियों, उत्पादकों, यात्रियों की सुविधा की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया गया।

अतः इसके विरुद्ध जनआंदोलन हुआ। विवश होकर सरकार ने अनेक रेलों को अपनी व्यवस्था के अंतर्गत ले लिया।1925 में ईस्ट रेलवे और जी.आई.पी.रेलवे, 1929 में ब्रह्मा रेलवे,1930 में सदर्न पंजाब रेलवे तथा 1942 में बी.बी.एण्ड सी.आई. रेलवे सरकार ने अपने हाथ में ले ली।

इसके बाद रेलों के प्रबंध व संचालन में परिवर्तन हुए और यात्रियों की सुविधाओं की ओर कुछ ध्यान दिया गया।

Note : अतः हम कह सकते हैं कि भारत में रेलों का आरम्भ 1853 में अंग्रेजों द्वारा अपनी प्राशासनिक सुविधा के लिये किया गया था सन् 1853 में पहली ट्रेन मुंबई से थाणे तक (34 कि॰मी॰ की दूरी) चली थी।

यातायात के अन्य साधन

किसी देश के आर्थिक जीवन में यातायात के साधनों का विशेष महत्त्व रहता है। विलियम बैंटिक(William Bantique) के समय तक अंग्रेजी सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।

सर्वप्रथम बैंटिक के काल में कलकत्ता और उत्तरी प्रांतों को जोङने वाली सङक के संबंध में योजना तैयार की गई, जिसे डलहौजी के काल में कार्यान्वित किया गया।

19 वी शता. के पूर्वार्द्ध तक प्रत्येक प्रांत में एक सैनिक समिति सङक निर्माण का कार्य करती थी। डलहौजी ने सार्वजनिक निर्माण विभाग की स्थापना करके सङक निर्माण का कार्य उसे सौंप दिया। 1929 में स्टेंडिंग कमेटी ऑफ रोड्स की स्थापना हुई तथा सङकों के निर्माण के लिए सङक कोष स्थापित किया गया।

द्वितीय विश्वयुद्ध (Second World War)में सङकों का महत्त्व स्पष्ट हो गया। अतः दिसंबर,1943 में नागपुर में विविध प्रांतों के चीफ इंजीनियर्स की एक सभा हुई, जिसमें सङकों के निर्माण के लिए पंचवर्षीय योजना बनाई गयी, जो अप्रैल,1947 में कार्यान्वित की गयी।

फलतः बंगाल,पंजाब,उत्तर प्रदेश आदि प्रांतों में सङकों का विस्तार हुआ। लेकिन ब्रिटिश शासन-काल में केवल उन्हीं स्थानों को सङकों से संबंधित किया गया, जो या तो ब्रिटिश आर्थिक हितों की पूर्ति में सहायक होते थे या सामरिक दृष्टि से ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक थे।

यातायात एवं आर्थिक विकास की दृष्टि से डाक,तार और टेलीफोन का भी अपना महत्त्व है। अंग्रेजी शासन के प्रारंभिक काल में डाक एक स्थान से दूसरे स्थान तक पैदल हरकारों द्वारा अथवा यत्र-तत्र घोङा-गाङियों के द्वारा भेजने की व्यवस्था थी।

19वी. शता.के पूर्वार्द्ध में डाकखानों की संख्या बहुत ही कम थी। लार्ड डलहौजी ने डाक-तार विभाग को पुनर्गठित किया।20 वी. शता. के आरंभ में डाकघरों की संख्या तथा तार लाइनों में खूब वृद्धि हुई। 1912 तक डायरेक्टर जनरल ऑफ टेलीग्राफ के अधीन तार विभाग एक अलग विभाग था, जो भारत सरकार के व्यापार व उद्योग विभाग के अंतर्गत था। किन्तु 1914 में डाक व तार विभाग सम्मिलित कर दिये गये।

भारत के आर्थिक जीवन में टेलीफोन ने बहुत समय के बाद प्रवेश किया। किन्तु भारत की टेलीफोन व्यवस्था पाश्चात्य देशों की अपेक्षा अधिक खर्चीली रही है। अतः इसका प्रयोग धनिकों,व्यापारियों, उद्योगपतियों तथा सरकारी विभागों तक सीमित रहा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद टेलीफोन का उपयोग अधिक बढ गया, अतः टेलीफोन का प्रसार द्रुतगति से हुआ।

प्रथम विश्वयुद्ध(First world war) तक वायुयानों का प्रयोग केवल युद्धों तक ही सीमित था, किन्तु इस युद्ध के बाद वायुयानों का उपयोग असैनिक कार्यों के लिए भी होने लगा।

इसके लिए सिविल एवियेशन डिपार्टमेंट की स्थापना की गई तथा वायुयान चलाने से संबंधित कार्यों का प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किया गया।वायुयान का विस्तार स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही अधिक हुआ।

रेलों के विस्तार के पूर्व भारत में नदियाँ यातायात का साधन थी। सिंधु नदी (Indus River)में समुद्र से लेकर अटक तक,चिनाब में वजीराबाद तक, सतलज में लुधियाना तक, गंगा में कानपुर तक और यमुना में आगरा तक नावें चलती थी।

किन्तु आगे चलकर ये नदियाँ नौ-परिवहन के योग्य नहीं रही, क्योंकि अंग्रेजों ने जल यातायात को उन्नत करने का कोई प्रयत्न नहीं किया।.

रेल विस्तार ने भी जल यातायात को क्षति पहुँचाई। कलकत्ता और इलाहाबाद के बीच यात्री और माल ढोने के लिए स्टीमरों की व्यवस्था की गई।

फिर भी दक्षिण भारत की कुछ नदियों तथा बंगाल में बहुत-सा माल आज भी देश के आंतरिक भागों में आता-जाता है।

Reference :http://www.indiaolddays.com

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