अंग्रेजों की अकाल के प्रति नीति

भारत कृषि प्रधान देश होने के कारण सदैव मानसून के हाथ का खिलौना रहा है। मानसून(Monsoon) के असफल होने पर न केवल फसल ही खराब होती है, बल्कि किसान को अपने पशुधन और हल से भी वंचित होना पङता है। तालाबों का पानी सूख जाता है और इनके कीचङ में नाना प्रकार के कीटाणु उत्पन्न हो जाते हैं, जिसका परिणाम होता है लाखों लोगों की मृत्यु।

प्रमुख अकालों का वर्णन

मुगल शासकों (Mughal ruler)के समय यद्यपि भूमि का प्रबंध तो कर दिया गया, किन्तु अकाल से रक्षा करने का कोई स्थायी प्रबंध नहीं किया गया। मुगलों के बाद कंपनी राजसत्ता ने भी 18 वी. शता.में इस और अधिक ध्यान नहीं दिया, क्योंकि उस समय कंपनी अपने राज्य विस्तार में व्यस्त थी। अतः राष्ट्रीय स्तर पर किसी नीति का निर्माण नहीं किया गया।

1937 में भयंकर अकाल पङा, लेकिन अकाल राहत के लिए कोई कार्य नहीं किया गया। 1857 के विप्लव (Revolt of 1857)के बाद इस भीषण समस्या की ओर ध्यान दिया गया।1857 से 1947 के मध्य अनेक अकाल आयोगों की नियुक्ति हुई, जिन्होंने समय-2 पर अकाल के कारणों को ज्ञात करके सहायता के लिए सिफारिशें की, किन्तु इस समस्या का कोई स्थायी हल नहीं ढूँढा जा सका, क्योंकि अंग्रेजों की भारतीय जनता के प्रति कोई सद्भावना नहीं थी।

1860 में भयंकर अकाल पङा, किन्तु उत्तरी-पश्चिमी प्रांत के दक्षिण-पूर्वी जिलों में थोङी-बहुत वर्षा हो जाने से अकाल की भयंकरता में कमी आ गई। भारत सरकार ने प्रथम बार कर्नल बेयर्ड स्मिथ( karnal beyard smith ) की अध्यक्षता में एक अकाल आयोग की नियुक्ति की।

किन्तु अकाल आयोग की सिफारिशें कार्यान्वित नहीं हो सकी।1866-77 में उङीसा और दक्षिण-पूर्वी समुद्र तट पर भयंकर अकाल पङा। इस अकाल से दस से बीस लाख लोग मौत के मुँह में चले गये।

व्यापारियों ने अनाज का भंडार भरकर स्थिति को और भी संकटमय बना दिया। सरकार ने समय पर अपना उत्तरदायित्व नहीं संभाला। उङीसा में पङे इस अकाल के कारणों तथा उसका सामना करने के उपायों पर विचार करने के लिए केम्पबेल(Campbell) की अध्यक्षता में एक अकाल आयोग नियुक्त किया गया।

इस आयोग ने अकाल का उत्तरदायित्व बंगाल(Bengal) सरकार पर डाला और कहा कि यदि सरकार समय पर उचित कदम उठाती तो लोगों को यह अकाल इतना कष्टदायक नहीं होता।आयोग ने सिफारिश की कि बंगाल सरकार समुचित रूप से कृषि आंकङों और भू-राजस्व(Land Revenue) का स्थायी अध्ययन करे।

यातायात एवं संचार के साधनों का विकास करना चाहिये। किन्तु सरकार ने खाद्यान्नों के निर्यात में कोई कमी नहीं की, जिसका परिणाम हुआ कि थोङी-सी प्राकृतिक आपत्ति के समय भयंकर अकाल की स्थिति उत्पन्न हो जाती थी।

1868-69 में उत्तर-पश्चिमी प्रांत,पंजाब और राजपूताना के कुछ भागों में अकाल पङा। सरकार ने इस दिशा में अधिक सजग रहने के आदेश जारी किए, फिर भी एक करोङ दो लाख लोगों को अपने जीवन से हाथ धोना पङा।

1873 मे पुनः मानसून असफल हो जाने से बिहार में भयंकर अकाल पङा।लार्ड नार्थब्रुक ने बर्मा से भारी मात्रा में चावल खरीदा तथा इस क्षेत्र में वितरित किया, जिससे अकाल की भयंकरता घट गई।यह प्रथम अवसर था, जबकि मनुष्यों को भूख से बचाया गया तथा अकाल का सफलतापूर्वक सामना किया गया,लेकिन यह समस्या का स्थायी हल नहीं था।

फलस्वरूप जब 1876-77 में पुनः मानसून असफल हो गया तब फिर भीषण अकाल पङा। 1876 में इसका प्रकोप मद्रास,बंबई,हैदराबाद और मैसूर तक ही सीमित रहा, किन्तु अगले वर्ष पुनः मानसून की असफलता के कारण इसने मध्य भारत एवं पंजाब के कुछ क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले लिया।

इतने विशाल क्षेत्र पर पूर्ण अकाल का प्रकोप कभी नहीं हुआ था। लार्ड लिटन (Lord Lytton)ने इस दिशा में कोई ठोस कार्य नहीं किया। जब लाखों लोग अकाल के कारण भूखों मर रहे थे, तब लिटन ने एक शानदार दरबार का आयोजन किया।

इतना ही नहीं, उसने 9लाख पौंड मूल्य का अनाज भी देश से निर्यात किया। परिणामस्वरूप केवल ब्रिटिश क्षेत्र में 50 लाख लोग अकाल की भेंट चढ गये।इससे लिटन की तीव्र आलोचना हुई। अतः लिटन ने सर रिचर्ड स्ट्रेची की अध्यक्षता में अकाल आयोग नियुक्त किया। स्ट्रेची आयोग(Strachey Commission) ने 1880 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसने मुख्य रूप से निम्न सुझाव दिये-

  1. अकाल के समय स्वस्थ व्यक्तियों को राहत कार्यों में नियुक्त किया जाय तथा उन्हें पेट भरने योग्य पारिश्रमिक दिया जाय। आयोग का अनुमान था कि 15 प्रतिशत किसान परिवार ऐसे कार्यों का लाभ उठाने को तैयार हो जायेंगे।
  2. विशेष परिस्थितियों में स्थानीय व्यापारियों को अनाज के वितरण का कार्य सौंपा जाय और उन पर करीब से नियंत्रण रखा जाय।
  3. अकालग्रस्त क्षेत्रों से भू-लगान स्थापित कर दिया जाय अथवा समाप्त कर दिया जाय तथा किसानों के कर्जे की व्यवस्था की जाय, जिससे कि किसान बैल तथा बीजों की व्यवस्था कर सकें।
  4. सामान्य राजस्व में 15 लाख पौंड का एक विशेष कोष तैयार किया जाय जो अकाल के समय लगान कम करने अथवा माफ करने के काम आ सके तथा अकालग्रस्त क्षेत्रों में नहरें खोदने एवं रेलें निकालने के काम आ सके।
  5. केन्द्र के नियंत्रण में स्थानीय अकाल कोड का निर्माण किया जाय।

इन सुझावों के आधार पर एक स्थायी कोष की स्थापना की गई। 1883 में अकाल कोड का निर्माण किया गया। इतिहासकार स्मिथ (Smith)ने लिखा है, अकाल नीति पर ठोस विचार प्रस्तुत करने के लिए लार्ड लिटन प्रशंसा का पात्र है। अकाल प्रशासन की संपूर्ण वर्तमान व्यवस्था उसके विचारों की आधारशिला पर खङी है।

लेकिन स्मिथ के इस कथन में की सत्यता प्रतीत नहीं होती।आयोग ने अकालग्रस्त क्षेत्रों में भू-राजस्व स्थगित करने की सिफारिश की थी, लेकिन इसका रुपया अधिकांशतः रेलों के निर्माण पर तथा सिंचाई के साधनों के विस्तार पर खर्च किया गया।

सिंचाई योजनाओं का विस्तार अधिकांशतः पंजाब (Punjab)में हुआ, जहाँ रूई के उत्पादन के योग्य भूमि थी। 1883 में अकाल कोड का निर्माण किया गया, लेकिन जब 1899-1901 में इस अकाल कोड के औचित्य की जाँच का अवसर आया, उस समय यह स्पष्ट हो गया कि अंग्रेजों का दृष्टिकोण मानवीय न होकर प्रशासनिक अथवा वित्तीय अधिक था। अतः समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं हुआ।

1895 में वर्षा कुछ कम हुई तथा 1896 में बिल्कुल नहीं हुई। फलस्वरूप संयुक्त एवं मध्य प्रांतों बरार,बंगाल,बंबई,मद्रास में कुछ जिलों और राजपूताना में भयंकर अकाल पङा।

इस अकाल की भयंकरता के लिए अकाल कोड अपर्याप्त सिद्ध हुए। अतः लार्ड एल्गिन ने सर जेम्स लायल की अध्यक्षता में एक आयोग नियुक्त किया।इस आयोग ने 1880 के आोयग के सुझाव के आधार पर ही अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।इस अकाल के समय भी भू-लगान की कमी करने की दिशा में कोई विशेष प्रयास नहीं किये गये।

1896 के अकाल के चिह्न अभी मिट भी नहीं पाये थे कि 1899 में भयंकर सूखा पङ गया। पंजाब, राजपूताना, बङौदा, बंबई,मध्य प्रांत, बरार,हैदराबाद और गुजरात इससे प्रभावित थे। केवल ब्रिटिश क्षेत्र में 10 लाख व्यक्ति अकाल की भेंट चढ गये। तथा 50 लाख पौंड की फसल नष्ट हो गई। देशी रियासतों में 30 लाख पौंड की क्षति हुई। लार्ड कर्जन (Lord curzon)ने सर मेकडोनल्ड की अध्यक्षता में एक आयोग नियुक्त किया।

इस आयोग ने भी भू – लगान स्थगित करने, ग्राम स्थर पर सार्वजनिक निर्माण कार्य करने, सिंचाई के साधनों का विकास करने, रेल यातायात का विस्तार करने तथा ग्रामीण साख संस्थाओं एवं कृषि बैंकों का गठन करने, रेल यातायात का विस्तार करने तथा ग्रामीण साख संस्थाओं एवं कृषि बैंकों का गठन करने का सुझाव दिया। इस आयोग के सुझावों के आधार पर अकाल कोड को संशोधित किया गया। भू-लगान के संबंध में केवल 12.50 लाख रुपयों का लगान माफ किया गया।

अकाल राहत कार्यों पर निर्भर रहने वाले लोगों की संख्या में निरंतर वृद्धि होती गई। 1880 में राहत कार्यों पर निर्भर रहने वाले लोगों की संख्या 15 प्रतिशत थी, जबकि 1899-1900 में कुछ क्षेत्रों में यह संख्या 44 प्रतिशत बढ गई।

व्यापारियों के पास खाद्यान्न का पर्याप्त भंडार था, लेकिन लोगों के पास उसे खरीदने के लिए धन नहीं था।

1907-8 में पुनः अकाल पङा। इस समय तक भारत में राष्ट्रवादी आंदोलन चल पङा था।अतः सरकार ने अकाल राहत के लिए तुरंत कार्यवाही की और अकाल को उत्तर प्रदेश तक सीमित कर दिया। सरकार ने किसानों को ऋण दिया तथा भू-लगान बी स्थगित कर दिया।

इसके बाद 1918 में पुनः मानसून की असफलता के कारण अकाल पङा। सरकार ने तुरंत सहायता कार्यों को कार्यान्वित किया। लेकिन सरकार के समस्त प्रयास बढते हुए जन-आंदोलन से विवश होकर किये गये थे, अतः अंग्रेजों ने ह्रदय से और मानवीय दृष्टिकोण से इस समस्या को कभी देखने का प्रयास नहीं किया। कृषि बैंकों तथा सहकारी बैंकों की स्थापना तो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही संभव हो सकी।

Reference : http://www.indiaolddays.com

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