भारतीय स्वतंत्रता में सहायक तत्व क्या थे

भारत की स्वतंत्रता में अनेक तत्त्वों ने योगदान दिया था। 1857 के बाद भारत में जो राष्ट्रीय जागरण उत्पन्न हुआ, उस राष्ट्रीय जागरण में अनेक तत्त्व अंतर्निहित थे।

मौलिक रूप से भारत की स्वतंत्रता में निम्न तत्त्व सहायक सिद्ध हुए-

  • गांधीजी के नेतृत्व में हुए राष्ट्रीय आंदोलन का भारत की स्वतंत्रता में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। बाह्य रूप से ऐसा प्रतीत होता है कि असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोङो आंदोलन अपने लक्ष्यों को प्राप्त न कर सके, किन्तु इन आंदोलनों के फलस्वरूप लोगों का ब्रिटिश शासकों की शक्ति में विश्वास समाप्त हो गया और जनता ब्रिटिश शासकों से सीधी टक्कर लेने लगी। शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों पर गोलियाँ चलाने व लाठियों की वर्षा करने से लोगों में वेदेशी शासकों के प्रति घृणा उत्पन्न हो गयी थी।
  • दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन इतना कमजोर हो गया था कि वह भारत पर अधिक समय तक नियंत्रण नहीं रख सकता था। ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने स्वयं ब्रिटिश संसद में इस बात को स्वीकार किया था।
  • देश में राष्ट्रीय जागरण केवल नागरिकों तक ही सीमित न रहा, बल्कि इसकी लहर पुलिस व सेना तक पहुँच चुकी थी। आजाद हिन्द फौज के अधिकारियों पर चलाये गये मुकदमों के फलस्वरूप सेना में भी नवीन चेतना आ गई थी। इसलिए 1946 में नौ-सेना का विद्रोह हुआ।इससे अंग्रेज भारतीय सेना की वफादारी पर संदेह करने लगे थे और अंग्रेजों को विश्वास हो गया था, कि भारतीय सेना पर निर्भर रहकर भारत पर शक्ति के बल पर शासन नहीं किया जा सकता।
  • इंग्लैण्ड में मजदूर दल की सरकार की स्थापना, भारत की स्वतंत्रता के लिए एक महत्त्वपूर्ण बात थी। मजदूर दल भारत को स्वतंत्रता देना चाहता था। सत्ता में आने से पूर्व ही आम चुनावों के अवसर पर उसने घोषित कर दिया था कि यदि मजदूर दल सत्ता में आया तो भारत को स्वतंत्र कर देगा। इंग्लैण्ड में जब तक अनुदार दल की सरकार रही, वह भारत में प्रजातीय विभेद की नीति एवं राष्टीय आंदोलन का दमन करने की नीति का अवलंबन करती रही।
  • मुस्लिम लीग द्वारा फैलाये गये साम्प्रदायिक दंगों का प्रभाव सेना, पुलिस और प्रशासन में भी फैल चुका था।
  • इंग्लैण्ड से शीघ्र स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए कांग्रेस ने देश के बँटवारे को स्वीकार कर लिया था। यदि कांग्रेस देश के बँटवारे को स्वीकार नहीं करती तो मुस्लिम लीग से कदापि समझौता नहीं हो सकता था। ऐसी परिस्थिति में अंग्रेज-मुस्लिम लीग गठबंधन देश की स्वतंत्रता में देरी उत्पन्न कर सकते थे।अतः कांग्रेस ने देश की शीघ्र स्वतंत्रता के लिए सबसे बङी कीमत चुकायी और वह कीमत थी- देश का बँटवारा
  • इंग्लैण्ड द्वारा भारत को स्वतंत्रता देना उसकी विवशता का भी द्योतक था।इंग्लैण्ड की आर्थिक स्थिति बिगङती जा रही थी और उसे अमेरिका से भारी मात्रा में ऋण लेना पङ रहा था। व्यापार संतुलन भी भारत के पक्ष में था, अतः युद्ध के समय भारत का भी ऋण इंग्लैण्ड पर चढ गया था। अतः इंग्लैण्ड के राजनीतिज्ञों में यह धारणा उत्पन्न हो गई थी कि भारत पर अधिक समय तक नियंत्रण बनाये रखना आर्थिक दृष्टि से हानिकारक है।

Reference : http://www.indiaolddays.com

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