भक्ति आंदोलन क्या था, इसके कारण तथा प्रमुख संत

भक्ति आंदोलन- सूफी आंदोलन की अपेक्षा अधिक प्राचीन है। उपनिषदों में इसकी दार्शनिक अवधारणा का पूर्ण प्रतिपादन किया गया है। भक्ति आंदोलन हिन्दुओं का सुधारवादी हिन्दुओं का सुधारवादी आंदोलन था। इसमें ईश्वर के प्रति असीम भक्ति, ईश्वर की एकता, भाई चारा, सभी धर्मों की समानता तथा जाति व कर्मकांडों की भर्त्सना की गई है। वास्तव में भक्ति आंदोलन का आरंभ दक्षिण भारत में सातवी से बारहवीं शताब्दी के मध्य हुआ, जिसका उद्देश्य नयनार तथा अलवार संतों के बीच मतभेद को समाप्त करना था। इस आंदोलन के प्रथम प्रचारक शंकराचार्य माने जाते हैं।

  • शंकराचार्य के उपरांत बारह तमिल वैष्णव संतों ने जो संयुक्त रूप से अलवार के नाम से प्रसिद्ध थे, ने भक्ति को काफी लोकप्रिय बनाया।
  • शैव नयनारों तथा वैष्णव अवलारों ने जैनियों और बौद्धों के अपरिग्रह को अस्वीकार कर ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत भक्ति को ही मुक्ति का मार्ग बताया। उन्होंने प्रेम और व्यक्तिगत ईश्वर भक्ति का संदेश समस्त दक्षिण भारत में स्थानीय भाषाओं का प्रयोग करके पहुंचाया।
  • वैष्णव संतों से शंकर के अद्वैत और ज्ञानमार्ग का विरोध किया। इन संतों के अनुसार परमात्मा निर्गुण नहीं सगुण है। इन्होंने ब्रह्म और जीव की पूर्ण एकता को स्वीकार किया।

भक्ति आंदोलन की विशेषताएँ –

  1. भक्ति की धारणा का अर्थ एकेश्वर के प्रति सच्ची निष्ठा है।
  2. भक्ति पंथ ने उपासना की विधियों के रूप में कर्मकांडों तथा यज्ञों का परित्याग किया।
  3. भक्ति आंदोलन समतावादी आंदोलन था जिसने जाति या धर्म पर आधारित भेदभाव का पूर्णतया निषेध किया।
  4. भक्ति संतों ने जनसाधारण की सामान्य भाषा ( क्षेत्रीय भाषा ) में उपदेश दिया, जिसके कारण हिन्दी, मराठी, बंगाली और गुजराती भाषाओं का विकास हुआ।
  5. भक्ति आंदोलन के मूल सिद्धांत सूफी संतों की शिक्षाओं से बहुत मिलते जुलते हैं।

भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत-

रामानुज-(12वी.शता.)

भक्ति आंदोलन के प्रारंभिक प्रतिपादन महान वैष्णव गुरु रामानुज थे। उनका जन्म तमिलनाडु राज्य में पेरंबदूर में हुआ था। वे सगुण ईश्वर में विश्वास करते थे। उन्होंने मनुष्य की समानता पर बल दिया और जाति व्यवस्था की भर्त्सना की। रामानुज के क्रिया-कलाप का मुख्य केन्द्र काँची और श्रीरंगपट्टम था।किन्तु इनके उपदेशों के प्रति चोल प्रशासन के विरोध के कारण यह स्थान छोङना पङा। रामानुज ने विशिष्टद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया। भक्ति आंदोलन के दूसरे नायक रामानुज के समकालीन निम्बार्क थे। वे द्वैताद्वैत दर्शन में विश्वास करते थे तथा ईश्वर के प्रति समर्पण पर बल देते थे।

माधवाचार्य – ( 13वी. शता. )

माधवाचार्य ने शंकर और रामानुज दोनों के मतों का विरोध किया।  माधवाचार्य का विश्वास द्वैतवाद में था और वे आत्मा व परमात्मा को पृथक-2 मानते थे। वे लक्ष्मी नारायण के उपासक थे।

रामानंद(15वी. शता.)-

रामानंद उत्तरी भारत के पहले महान भक्त संत थे। वे रामानुज के शिष्य थे। रामानंद ने दक्षिण और उत्तर भारत के भक्ति आंदोलन के बीच सेतु का काम किया अर्थात् भक्ति आंदोलन को दक्षिण भारत से उत्तर भारत में लाये। उनका जन्म इलाहबाद में हुआ था। उन्होंने विष्णु के स्थान पर राम की भक्ति आरंभ की।  उन्होंने अपमे उपदेश संस्कृत के स्थान पर हिन्दी में दिये जिससे यह आंदोलन लोकप्रिय हुआ और हिन्दी साहित्य का निर्माण आरंभ हुआ। रामानंद ने चारों वर्णों को भक्ति का उपदेश दिया। उन्होंने सिद्धांत के आधार पर जाति पर्था का कोई विरोध नहीं किया किन्तु उनका व्यावहारिक जीवन जाति समानता में विश्वास करने का था।

रामानंद के 12 शिष्य थे- उनमें कई जातियों के लोग थे, जैसे – रविदास ( रैदास ) चमार, कबीर जुलाहा, धन्ना जाट ( किसान ), सेन नाई, सघना कसाई, पीपा राजपूत आदि। 

वास्तव में मध्ययुग का धार्मिक आंदोलन रामानंद से आरंभ हुआ।

कबीर-( 1440-1510ई. )

कबीर सिकंदर लोदी के समकालीन थे। उन्होंने अपने गुरु रामानंद के सामाजित दर्शन को सुनिश्चित रूप दिया। वे हिन्दू मुस्लिम एकता केहिमायती थे। कबीर के ईश्वर निराकार और सर्वगुण थे। उऩ्होंने ननते जात- पात, मूर्ति पूजा तथा अवतारसिद्धांत को अस्वीकार किया। कबीर की शिक्षाएं बीजक मेंं संग्रहीत है। उनके अनुयायियों को कबीरपंथी कहा जाता था। निर्गुण भक्ति धारा में कबीर पहले संत थे जो संत होकर भी अंत तक गृहस्थ बने रहे। वे साम्यवादी विचारधारा के थे।

जो लोग तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के तीव्र आलोचक थे और हिन्दू मुस्लिम एकता के पक्षपाती थे उनमें से कबीर और नानक का योगदान सबसे अधिक है।

रविदास – ( रैदास) ( 15वी. शता.)

ये रामानंद के अति प्रसिद्ध शिष्यों में से थे। जे जन्म से चमार थे लेकिन इनका धार्मिक जीवन जितना गूढ था, उतना ही उन्नत और पवित्र था। सिक्खों के गुरू ग्रंथ साहिब में संग्रहीत रविदास के तीस से अधिक भजन हैं। रविदास के अनुसरार मानव सेवा ही जीवन में धर्म की सर्वोत्कृष्ट अभिव्यक्ति का माध्यम है।

दादू ( 1544-1603ई.)-

कबीर तथा नानक के साथ निर्गुण भक्ति की परंपरा में दादू  का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनका जम्म अहमदाबाद में एक जुलाहा के यहाँ हुआ था इऩकी मृत्यु 1603ई. में  राजस्थान के नराना या नारायण गाँव में हुई जहाँ इनके अनुयायियों ( दादू- पंथियों ) का मुख्य केन्द्र है।

गुरुनानक( 1469-1538ई.)

इनका जन्म 1469ई. में तलवंडी ( आधुनिक ननकाना) पंजाब में एक खत्री परिवार में हुआ। एकेश्वरवाद तथा मानव मात्र की एकता गुरु के मौलिक सिद्धांत थे।

चैतन्य ( 1486-1533ई.)-

इनका जन्म 1486ई. में नवद्वीप या नदिया (बंगाल) में हुआ था। चैतन्य का वास्तविक नाम विश्वभर था पर बाल्यावस्था में इनका नाम निमाई था। शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत इन्हें विद्यासागर की उपाधि प्रदान की गई।

वल्लभाचार्य(1479-1531ई.)-

बल्लभाचार्य वैष्णव धर्म के कृष्ण मार्गी शाखा के दूसरे महान संत थे।

मीराबाई(1498-1546ई.)-

मीराबाई सोलहवीं शता. के भारत की एक महान महिला संत थी।

सूरदास( 16वी.-17वी.शता.)-

इनका जन्म आगरा मथुरा मार्ग पर रुनकता नामक ग्राम में हुआ था। ये अकबर एवं जहाँगीर के समकालीन थे।

तुलसीदास ( 1532-1623ई.)-

तुलसीदास जी मुगल शासक अकबर के समकालीन थे।

Reference : http://www.indiaolddays.com

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