मुगल प्रशासन में संस्कृतिः समाज,धार्मिक जीवन

मुगलों की संस्कृति

अन्य संबंधित महत्त्वपूर्ण तथ्य –

मुगलकालीन समाज-

मुगलकालीन समाज दो वर्गों में बंटा था- धनी वर्ग एवं जनसाधारण जैसे किसान,दस्तकार एवं श्रमिक आदि।

उच्च वर्ग के लोगों में अधिकतर मनसबदार,जागीरदार एवं जमीदार तथा राजकीय संरक्षण प्राप्त सरकारी अधिकारी होते थे ये लोग बहुत ही ऐश्वर्य और विलासिता का जीवन बिताते थे।

बादशाहों तथा राज्य के बङे-2 सरदारों के हरम में हजारों स्रियाँ – उपपत्नियाँ , रखैलों और दासियों के रूप में रहती थी।

अकबर के हरम में करीब पाँच हजार स्रियाँ थी इसी प्रकार की स्थिति अन्य अन्य बाादशाहों की भी थी।हिन्दू राजा मानसिंह के हरम में 1500 स्रियाँ थी।

मुगल बादशाहों में एक मात्र औरंगजेब ही था जो अपनी एक पत्नी के प्रति ही समर्पित था इसके अतिरिक्त वह शराब तथा अन्य मादक द्रव्यों का सेवन नहीं करता था। हुमायूँ तो अफीम का बहुत शौकीन था।

इसी प्रकार जहाँगीर हमेशा शराब में डूबा रहता था।उसकी इसी आदत के कारण उसकी पत्नी मान बाई ने आत्म हत्या कर ली थी।

बाबर ने अपनी आत्मकथा (तुजुके-ए-बाबरी) में जन साधारण का वर्णन करते हुए कहा है कि- यहाँ के किसान तथा निम्न वर्ग के लोग लगभग नंगे रहते थे।

बाबरनामा की पुष्टि करते हुए राल्फपिच (अकबर के काल में आया था) ने कहा है कि बनारस में पुरुष कमर में एक छोटे से कपङे को छोङकर नंगे ही रहते थे।

भूमिहीन किसान तथा श्रमिक मनुष्यों के उस वर्ग से संबंध रखते थे।जिन्हें अछूत या कमीन समझा जाता था।

मुगलकालीन समाज में पर्दा प्रथा,बाल-विवाह का निषेध,बहु-विवाह तथा दहेज प्रथा आदि अनेक सामाजिक कुरीतियाँ प्रचलित था।यद्यपि अकबर ने इन कुरीतियों को रोकने का प्रयास किया था।

मुगल काल में कुछ कुलीन स्रियों को सम्मानित स्थिति प्राप्त थी जैसे- अकबर की धाय माँ माहम अनगा ने 1560-62 तक पेटीकोट-सरकार  चलाई थी और राज्य की सर्वेसर्वा रही।

इसी प्रकार अकबर ने काबुल को जीतकर उसका शासन अपनी चचेरी बहन बख्तुन्निसा को दे दिया।

नूरजहाँ तो जहांगीर के शासन में बराबर की सहभागी थी।मुगल राजाज्ञाओं पर उसका भी हस्ताक्षर होता था।वह जहाँगीर के साथ झरोखा दर्शन देती थी।तथा राजकीय सिक्कों पर उसका भी नाम अंकित होता था।

औरंगजेब ने अपनी बङी बहन जहांआरा को 1660ई. में शाहजहाँ की मृत्यु के बाद बङे ही सम्मान के साथ साम्राज्य की प्रथम महिला के रूप में उसका पद वापस कर दिया था।

दहेज प्रथा को अकबर तथा तत्कालीन मराठा सरदारों ने भी समाप्त करने का प्रयत्न किया।

इसी प्रकार महाराष्ट्र के गैर ब्राह्मणों तथा पंजाब एवं यमुना घाटी के जाटों में विधवा-पुनर्विवाह प्रचलित था।

नूरजहाँ की माँ अस्मत-बेगम ने इत्र बनाने की विधि का आविष्कार किया था। नूरजहाँ एवं मुमताज महल ने अनेक श्रृंगार के प्रसाधनों एवं जेवरों में रूचिपूर्ण परिवर्तन किये। थे।

मुगलकालीन प्रसिद्ध महिलाएँ-

गुलबदन बेगम- हुमायूँनामा की रचना की। वह अरबी और फारसी की प्रकाण्ड विदुषी थी।

माहम अनगा- अकबर की धाय माँ माहम अनगा 1560-62ई. तक पर्दा-शासन या पेटीकोट सरकार को चलाया। इसने हुमायूँ के साथ मिलकर दिल्ली में मदरसा -ए-बेगम की स्थापना की।

नूरजहाँ- जहाँगीर की पत्नी, जुंतागुट का नेतृत्व किया, शासनकार्य में बराबर का हिस्सा लिया।इसने अनेक श्रृंगार -प्रसाधनों एवं जेवरातों में सुरुचिपूर्ण परिवर्तन किया।

मुमताज महल- शाहजहाँ की प्रिय पत्नी । यह भी श्रृंगार – प्रसाधनों और जेवरातों की बङी विशेषज्ञ थी।

जहाँआरा-शाहजहाँ की बङी पुत्री, बङी ही धार्मिक एवं सात्विक विचारधारा की महिला, उत्तराधिकार के युद्ध में दारा का पक्ष लिया। सूफी मत के कादिरी सिलसिले से प्रभावित, शाहजहाँ के बंदी समय में यह शाहजहाँ के साथ रही।

जेबुन्निसा- औरंगजेब की पुत्री, विद्रोही शहजादा अकबर के पत्र व्यवहार करने के कारण औरंगजेब ने 1679ई. में निर्वासित कर दिल्ली भेज दिया। यहीं पर उसने बैतुल-उल-उलूम नामक पुस्तकालय की स्थापना की।

अस्मत बेगम – इत्र बनाने की विधि का आविष्कार किया। यह नूरजहाँ की माँ थी।

औरंगजेब की पुत्री जेबुन्निसा ने जिसे-विद्रोही शहजादे अकबर के साथ पत्र व्यवहार करने के कारण 1679 में निर्वासित कर दिल्ली भेज दिया गया था, ने दिल्ली में एक पुस्तकालय –बैतुल-उल-उलूम की स्थापना की थी।

मुगल बादशाहों की धार्मिक नीति-

मुगलकाल मे ंधर्म और राज्य का घनिष्ठ संबंध था किन्तु मुगल बादशाहों में (औरंगजेब को छोङकर) किसी ने भी धार्मिक कट्टरता की नीति नहीं अपनायी।बाबर ने समरकंद पर अधिकार करने के लिए फारस के शाह से समझौते के तहत शिया मत को स्वीकार कर लिया था।जिसे बाद में छोङ दिया।

यद्यपि बाबर ने खानवा और चंदेरी के युद्ध में जिहाद (धर्म युद्ध) का नारा दिया जाता था।और गाजी (योद्धा एवं धर्म प्रचारक) की उपाधि धारण की थी।उसने हिन्दुओं से जजिया कर भी वसूल किया था फिर भी वह धार्मिक मामलों में असहिष्णु नहीं था।

बाबर सूफी मत के नक्शबंदी सिलसिले से संबंधित था। वह ख्वाजा उबैदुल्ला अहरार का परम भक्त था।

हुमायूँ भी सूफी संतों से बहुत प्रभावित था।वह सूफियों की शत्तारी सिलसिले से संबंधित था वह प्रसिद्ध सूफी संत मुहम्मद गौस का शिष्य था।

प्रारंभ में अकबर पूर्णतः सुन्नी था। वह सुन्नी सद्र अब्दुलनबी का इतना आदर करता था  कि शिष्यों की तरह उसके जूते उठाकर उसके पैरों के सामने रखता था।

अकबर द्वारा प्रवर्तित दीन-ए-इलाही  कोई धर्म नहीं बल्कि एक सूफी पंथ था जिसके नियम सर्व धर्म समन्वय पर आधारित थे।

जहाँगीर के समकालीन मोहसिन फानी ने अपनी रचना दविस्तान-ए-मजाहिब में पहलीबार दीन-ए-इलाही  को एक स्वतंत्र धर्म के रूप में प्रस्तुत किया। अकबर ने 1563ई. में तीर्थ यात्रा कर तथा 1564ई. में जजिया कर को समाप्त कर दिया था।

सामाजिक सुधार के क्षेत्र में अकबर ने दास-प्रथा (1562ई.) में, बाल-विवाह तथा सती-प्रथा को समाप्त करने का आदेश दिया था किन्तु यह अंतिम रूप से औरंगजेब के समय में ही कठोरता के साथ बंद किया जा सका था।

जहाँगीर ने पुर्तगाली पादरी फादर जेवियर  से ईसाई धर्म की शिक्षा ग्रहण की थी तथा उसने जदरूप नामक एक हिन्दू को हिन्दुओं का जज नियुक्त किया था।

जहाँगीर ने पहली बार 1612ई. में रक्षा बंधन का त्यौंहार मनाया तथा अपनी कलाई पर राखी बंधवायी एवं 1616 ई. में शिवरात्री के दिन योगियों से भेंट की।

जहाँगीर ने जैन संत सिद्धचंद्र को नादिरे-जमाँ की उपाधि प्रदान की थी।

जहाँगीर ने रविवार (अकबर के जन्म दिन) और बृहस्पतिवार (अपने राज्यारोहण के दिन) को साम्राज्य में पशु हत्या बंद करने की आज्ञा दी थी।

1610ई. में दानियाल के पुत्र को पादरियों ने ईसाई बना लिया था जिस पर जहांगीर ने कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की थी।जो उसकी धार्मिक सहिष्णुता की पराकाष्ठा कही जा सकती है।

जहांगीर ने जैनियों को अपने साम्राज्य से निष्कासन की आज्ञा इसलिए दी थी क्योंकि जैन संत मानसिंह ने यह घोषणा की थी कि उसका शासन दो वर्ष से अधिक नहीं चलेगा।

जहाँगीर ने अपने दरबार में काजी,मीर-ए-अदल,सद्र तथा इस्लाम धर्म के अन्य विद्वानों को सिजदा न करने की छूट दी थी।

जहाँगीर ने अमीरों अथवा मनसबदारों की जब्त संपत्ति का 1/4 भाग मस्जिदों के निर्माण तथा इस्लामी शिक्षा पर खर्च करने की आज्ञा दी थी।

किन्तु जहाँगीर  ने कभी-2 इस्लाम का पक्ष लिया था जैसे

  1. रजौरी के हिन्दुओं को दंड देना क्योंकि वे मुस्लिम लङकियों से विवाह करके उन्हें हिन्दू बना लेते थे।
  2. कागङा विजय के बाद उसने गाय कटवाकर जश्न मानाया था।
  3. अजमेर में स्थित वाराह मंदिर की मूर्ति को तालाब में फिकवाना।

शाहजहाँ ने प्रारंभ में उलेमाओं के प्रसन्न करने के लिए सिजदा प्रथा तथा पाबोस (पायबोस) को समाप्त करके उसके स्थान पर चहार-तस्लीम की प्रथा को शुरू किया।

मुगल काल (अकबर और जहांगीर के काल) में मुगल सम्राट राजपूत राजाओं के राज्यारोहण के अवसर पर उसके मस्तक पर टीका लगाकर अपनी स्वीकृति  देते थे।किन्तु शाहजहाँ ने यह कार्य स्वयं न करके अपने प्रधानमंत्री को सौंप दिया था।

शाहजहाँ तीर्थ-यात्रा कर को पुनः शुरू करना चाहता था,किन्तु काशी  के प्रसिद्ध विद्वान एवं अपने मित्र कविन्द्राचार्य के कहने पर अपनी आज्ञा वापस ले ली थी।

शाहजहाँ ने राज्य के कुछ भागों में विशेषकर पंजाब,कश्मीर,और गुजरात के हिन्दू और मुसलमान आपस में जो  व्यापार करते थे उसको 1634 ई. में बंद करवा दिया।

शाहजहाँ ने आमेर के कच्छवाहा राजा राजसिंह के पुत्र बख्तावरसिंह को इस्लाम स्वीकार करने के कारण 2000 रु. नकद एवं एक सरोपा भेंट किया था।

कालांतर में दारा एवं जहाँआरा के प्रभाव में आकर शाहजहाँ ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनायी।

दारा ने स्वयं केशवराय (मथुरा) मंदिर के लिए एक पत्थर की वेदिका प्रदान की थी।

औरंगजेब अपने प्रशासन का संगठन शरियत के अनुसार करना चाहता था।उसने एक सच्चे मुसलमान का जीवन व्ययतीत किया ।

1647ई. में अपने बल्ख अभियान के समय युद्ध भूमि में जब युद्ध पूरे जोरों पर था, परंतु संध्या की नमाज का समय होते ही वह (औरंगजेब) अपने घोङे से उतरा और युद्ध के मैदान में ही नमाज पढने लगा जिसे देखकर शत्रु की सेनाएँ भी चकित रह गयी।

औरंगजेब ने इस्लाम धर्म के नियमों का पालन कराने के लिए अपने शासन काल में – मुहतसिब (सार्वजनिक सदाचार-निरीक्षक) नामक अधिकारी नियुक्त किया।उसके काल का पहला मुहतसिब  समरकंद की निवासी-मुल्ला औजवाजीह था।

औरंगजेब ने अपनी धार्मिक नीति के कारण ही सिक्कों पर कलमा खुदवाया,झरोखा दर्शन , तुलादान , नौरोज दरबार में नृत्य संगीत हिन्दू त्योहारों , राजपूत राजाओं का टीकाकरण सिजदा तथा पायबोस आादि अनेक शरियत विरुद्ध प्रथाओं को बंद करवा दिया।

औरंगजेब के शासन काल में 1665ई. में जयसिंह ने शिवाजी के सेनापति नेतोजी को बंदी बनाकर मुगल दरबार में भेजा जिसे इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेने के कारण 3500 का मनसब प्रदान किया गया और स्वतंत्र कर दिया गया।बाद में वह शिवाजी के पास भाग गया।

Reference : http://www.indiaolddays.com

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