देशी राज्यों(रियासतों) का भारतीय संघ में विलय

स्वतंत्रता से पूर्व की रियासतों की कहानी-

1857 ई. में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध प्रथम स्वाधीनता का संग्राम हुआ। इस संग्राम में अधिकांश भारतीय नरेशों ने अंग्रेजों के प्रति अपनी स्वामिभक्ति का परिचय देते हुए, ब्रिटिश सत्ता के साथ सहयोग किया था।

परिणामस्वरूप 1857 ई. की क्रांति के बाद भारतीय राज्यों के प्रति ब्रिटिश नीति में परिवर्तन आया और महारानी विक्टोरिया की औपचारिक घोषणा में यह स्पष्ट कर दिया गया था, कि भविष्य में देशी राज्यों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय नहीं किया जायेगा।

इस प्रकार 1947 ई. तक भारत में ब्रिटिश प्रांतों का प्रशासन अलग चलता रहा और देशी रियासतों का प्रशासन भी अलग-2 चलता रहा।ब्रिटिश प्रांतों व देशी रियासतों के प्रशासन में कोई एकरूपता नहीं थी।

जिस समय भारत में राष्ट्रीय आंदोलन जोर पकङता जा रहा था, तब ब्रिटिश सरकार ने अपनी पूर्व प्रचलित फूट डालो और राज करो की नीति का पालन करते हुए भारतीय समस्या को सुलझाने के प्रयत्न आरंभ किये तथा लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन किया गया।

इन गोलमेज सम्मेलनों में हुए विचार-विमर्श के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने भारत के भावी सुधारों के संबंध में एक श्वेत-पत्र जारी किया तथा ब्रिटेन की संयुक्त संसदीय समिति ने इस श्वेत-पत्र पर विचार कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

इस रिपोर्ट के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने 1935 का अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम में एक भारतीय संघ (Indian Union)स्थापित करने की बात कही गई और इस भारतीय संघ में देशी रियासतों को भी शामिल होने का अधिकार दिया गया।

लेकिन 1937 में जब यह अधिनियम लागू किया तब, चूँकि देशी रियासतों के शासकों ने संघीय व्यवस्था को लागू करने में अनेक अवरोध उत्पन्न किये, अतः संघीय व्यवस्था को लागू ही नहीं किया गया। 1946 ई. में मंत्रिमंडल मिशन ने यह घोषणा कर दी थी, कि भारत में देशी राज्यों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता (पेरामाउण्टसी) समाप्त कर दी जायेगी। देशी रियासतों को यह भी अधिकार दे दिया गया,कि यह उनकी इच्छा पर निर्भर होगा,कि वे संघ के संविधान को माने या न माने।

स्वतंत्रता के समय की रियासतों की स्थिति-

भारत की स्वाधीनता से पूर्व देश में 562 देशी रियासतें थी। समस्त भारत का 2/5 क्षेत्र तथा 1/4 जनसंख्या इन रियासतों में निवास करती थी।

प्रशासन,क्षेत्रफल, जनसंख्या और वित्तीय संसाधनों की दृष्टि से इन राज्यों में भारी असमानता थी। इन राज्यों में वहाँ की जनता को कोई अधिकार नहीं थे। कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन के बाद कुछ देशी रियासतों में नागरिक अधिकार एवं उत्तरदायी सरकार के लिए आंदोलन हुए, परंतु कोई विशेष सफलता नहीं मिली।

ब्रिटिश सरकार ने जब भारत की सत्ता भारतीयों को हस्तांतरित करने का निश्चय कर लिया तब 4 अगस्त,1947 को ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 पारित किया। इस अधिनियम द्वारा देशी राज्यों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता पुनः देशी राज्यों को लौटा दी गई अर्थात् देशी रियासतें पूर्ण स्वतंत्र हो जायेंगी और उनकी इच्छा पर निर्भर होगा, कि वे चाहें तो पाकिस्तान में मिलें या हिन्दुस्तान में अथवा चाहें तो अपना स्वतंत्र अस्तित्व भा बनाये रख सकती हैं।

इस प्रकार अंग्रेज भारत से जाते-जाते भारत की एकता को नष्ट कर गये। ब्रिटिश सत्ता के इस निर्णय से कुछ भारतीय नरेशों को हार्दिक प्रसन्नता हुई और वे यह स्वप्न देखने लगे कि आरंभ में वे पूरी तरह स्वतंत्र रहेंगे और फिर मनचाही शर्तों पर भारत या पाकिस्तान से या किसी अन्य राज्य से संबंध करने के लिए स्वतंत्र होंगे।

इतना ही नहीं यदि उनकी शर्तें नहीं मानी गई तो वे अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी बनाये रख सकेंगे।इसमें कोई संदेह नहीं कि, भारतीय नरेशों की इस प्रकार की भावना को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारी उत्तरदायी थे।

उन्होंने भारतीय समस्या को जटिल बनाने में कोई कसर नहीं छोङी। वस्तुतः अंग्रेजों ने भारत को बाल्कन देशों की भाँति छिन्न- भिन्न करने का षड्यंत्र रचा।

सरदार पटेल और देशी राज्य-

5 जुलाई,1947 ई.को अंतरिम सरकार के गृहमंत्री सदार बल्लभ भाई पटेल के निर्देशन में राज्य मंत्रालय की स्थापना की गई और उन्हें भारत की ओर से देशी नरेशों के साथ बातचीत करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया।

15 अगस्त,1947 को भारत स्वतंत्र हो गया।भारत के विभाजन के समय खैरपुर,बहावलपुर आदि रियासतें पाकिस्तान में शामिल हो गई और शेष भारत में रह गई।सरादर पटेल ने भारतीय नरेशों से अपील की कि भारत के सामूहिक हितों को ध्यान में रखते हुए वे देश की अखंडता को बनाये रखने में मदद करें।

सर्वप्रथम, उन्होंने प्रतिरक्षा, विदेशी संबंध और संचार व्यवस्था जैसे तीन मुख्य विषयों के संबंध में ही राज्यों को भारतीय संघ में सम्मिलित होने का आग्रह किया।उन्होंने नरेशों को यह विश्वास भी दिलाया कि भारतीय कांग्रेस राज्यों के आंतरिक मामलों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगी।

उन्होंने राजाओं की सांस्कृतिक भावना को जागृत करते हुए उनके आर्थिक हितों की वकालत करते हुए मैत्री और सद्भावाना का हाथ बढाया।

सरदार पटेल को इस कार्य में लार्ड माउंटबेटन तथा राज्य मंत्रालय के सचिव वी.पी.मेनन और राजाओं की परिषद् (चेम्बर ऑफ प्रिन्सेज) के चांसलर महाराजा पटियाला से पूरा-2 सहयोग मिला।

परंतु सरदार पटेल का कार्य सरल नहीं था। क्योंकि 1937 ई. में प्रतिरक्षा, विदेशी संबंध और संचार
व्यवस्था इन तीनों विषयों के संबंध में भी इन देशी नरेशों ने भारतीय संघ में शामिल होना पसंद नहीं किया था । इसका परिणाम यह निकला कि 1935 के अधिनियम की संघीय व्यवस्था लागू नहीं हो पाई।

1947 ई. में तो परिस्थिति बदल चुकी थी। अब दो मुख्य बाधाएँ आ खङी हुई। पहली बाधा जिन्ना द्वारा खङी की गई। वे देशी नरेशों को पथ-भ्रांत कर रहे थे। पाकिस्तान में शामिल होने के लिए वे भारतीय नरेशों की प्रत्येक शर्त को मानने के लिए तैयार थे।

दूसरी बाधा भोपाल के नवाब जैसे कुछ राजाओं ने खङी कर दी। ये नरेश पाकिस्तान और भारत-दोनों के साथ कूटनीतिक संबंध कायम करने के पक्ष में थे, ताकि उनकी स्वतंत्र सत्ता बनी रह सके। परंतु लार्ड माउंटबेटन ने देशी नरेशों को भौगोलिक एवं ऐतिहासिक संबंधों का स्मरण कराकर दूसरी कठिनाई को दूर कर दिया।

देशी राज्यों के भारतीय संघ में शामिल होने के लिए प्रक्रिया तय कर दी गई।राज्यों को दो दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने का सुझाव दिया गया। एक का नाम था- इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन और दूसरे का नाम था- स्टेंडस्टिल एग्रीमेंट

पहले दस्तावेज पर हस्ताक्षर करके कोई भी नरेश भारतीय संघ में सम्मिलित हो सकता था, परंतु उसके लिए प्रतिरक्षा, विदेशी मामले और यातायात एवं संचार व्यवस्था का उत्तरदायिकत्व संघीय सरकार को सौंपना जरूरी था।

दूसरे दस्तावेज के अनुसार अंग्रेजी साम्राज्य में केन्द्रीय सरकार की जो स्थिति थी, अब उसके स्थान पर संघीय व्यवस्था में केन्द्रीय सरकार की व्यावहारिक स्थिति को मान्यता प्रदान करना था।

सरदार पटेल के प्रयत्नों से जूनागढ(सौराष्ट्र), हैदराबाद(दक्षिण भारत) और जम्मू – कश्मीर के अतिरिक्त सभी देशी रियासतें ( लगभग 136) भारतीय संघ में मिलने और भारतीय संघ को कुछ विषय देने तथा संविधान को मानने के लिए तैयार हो गयी।

Reference : http://www.indiaolddays.com

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