गोपाल कृष्ण गोखले का जीवन परिचय (1866-1915)

गोपाल कृष्ण गोखले(Gopal Krishna Gokhale) भारत के राष्ट्र निर्माताओं में प्रथम श्रेणी के महान् व्यक्ति थे। वे भारतीय राजनीति के महान् उदारवादी नेता(Moderate leader), व्यावहारिक आदर्शवादी, उदार, बुद्धिजीवी और गाँधीजी के राजनीतिक गुरु थे, जिन्होंने अपने ज्ञान, उत्साह, त्याग और साहस से भारत में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार किया। वे काँग्रेस के सम्माननीय नेता थे और उन्होंने काँग्रेस की नींव मजबूत करने तथा काँग्रेस को राष्ट्रीय आंदोलन (National Movement)का केन्द्र-बिन्दु बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

बहुत ही छोटी अवस्था में उन्होंने अपने आपको देश-सेवा के लिए पूर्णतया समर्पित कर दिया। गोखले एक युग पुरुष थे और उन्होंने अहिंसा व मानवतावादी सिद्धांतों को प्रचारित कर देश में नूतन आशा और विश्वास उत्पन्न किया।

गोखले का जीवन परिचय

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9मई, 1866 ई. को महाराष्ट्र (Maharashtra)के रत्नगिरि जिले के एक कोतलुक ग्राम में महाराष्ट्रीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था।जब उनकी आयु 13 वर्ष की थी तभी उनके पिताजी का देहांत हो गया और गोखले को अपनी शिक्षा प्राप्त करने के लिए कठिन संघर्ष करना पङा।

वे प्रायः सङक की बत्ती की रोशनी में बैठकर पढते थे तथा स्वयं हाथ से खाना पकाकर खाते थे। उसमें लगन व अथक परिश्रम करने की क्षमता थी। 1884 ई. में 18 वर्ष की आयु में बंबई के एलफिन्सटन कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और पूना के एक अंग्रेजी स्कूल में अध्यापक हो गये।

यह स्कूल आगे चलकर प्रसिद्ध फर्ग्यूसन महाविद्यालय के रूप में विकसित हुआ और गोखले 1902 ई. में उसके आचार्य पद से रिटायर हुए थे।यद्यपि वे इतिहास और अर्थशास्त्र के प्राध्यापक थे, किन्तु गणित में विशेष योग्यता रखते थे तथा अंग्रेजी भाषा के प्रति उनका विशेष लगाव था।

उन्होंने एडमंड बर्क की पुस्तक रिफ्लेक्शन्स ऑफ द् फ्रेंच रिवोल्यूशन को कंठस्थ कर, बर्क से न केवल भाषण कला की प्रेरणा प्राप्त की बल्कि ब्रिटिश रूढिवाद को भी अपना लिया। गोखले का उदारवादी चिंतन तथा उनके क्रांति विरोधी विचार, बर्क के विचारों से ही प्रभावित थे।

गोखले एक शिक्षक के रूप में

गोखले ने अपना जीवन एक शिक्षक के रूप में आरंभ किया। वे दक्कन एजुकेशन सोसाइटी के आजीवन सदस्य बन गये तथा अल्प वेतन पर लगातार बीस वर्षों तक इसकी सेवा की। आर्थिक वैभव और जीवन के सभी सुखों को त्यागकर उन्होंने समाज सेवा को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।

जिस समय वे फर्ग्यूसन कॉलेज में कार्यरत थे तब उनकी भेंट महादेव रानाडे(Mahadev Ranade) से हुई। वे गोखले की बुद्धिमता और कर्त्तव्य-परायणता से अत्यधिक प्रभावित हुए। रानाडे के मार्ग निर्देशक में उन्होंने अपना सार्वजनिक जीवन आरंभ किया। वे रानाडे को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।

रानाडे के संरक्षण में उन्होंने संवैधानिक कार्य प्रणालियों को सीखा और प्रत्यक्ष रूप से वे सार्वजनिक कार्यों से संबंधित हुए। रानाडे ने उन्हें, सार्वजनिक हितों की माँग करने के लिए सरकार को ज्ञापन एवं याचिकाएँ देने का कार्य सौंपा जिससे उन्हें विधायी कार्यों को दक्षता से निभाने का प्रशिक्षण मिला।

रानाडे ने उन्हें पूना की सार्वजनिक सभा का सचिव बनवा दिया। यह सभा बंबई प्रदेश की मुख्य राजनीतिक संस्था थी, अतः इस संस्था का कार्य करते हुए गोखले प्रांत के प्रमुख व्यक्तियों में गिने जाने लगे। फर्ग्यूसन कॉलेज के विस्तार के लिए धन एकत्रित करने के लिए उन्होंने महाराष्ट्र का दौरा करना पङता था।

इसलिए वे कई व्यक्तियों के संपर्क में आये। फर्ग्यूसन कॉलेज के सहकर्मी के रूप में वे तिलक और आगरकर के संपर्क में आये थे।वे तिलक को अत्यधिक श्रद्धा से देखते थे, परंतु उनके विचारों से सहमत नहीं थे। तिलक से वैचारिक मतभेद के कारण महाराष्ट्र में दो गुट बन गये-रानाडे और गोखले एक गुट में तथा दूसरे में तिलक तथा उनके सहयोगी थे।

1896 ई. में तिलक ने पूना की सार्वजनिक सभा पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।अतः गोखले ने सार्वजनिक सभा से त्यागपत्र दे दिया और रानाडे के मार्ग निर्देशन में दक्कन सभा की स्थापना की । 31 वर्ष की आयु में ही दक्कन सभा ने उन्हें इंग्लैण्ड में वेल्वी आयोग के समक्ष सभा का प्रतिनिधित्व करने भेजा।

नौकरियों का भारतीयकरण करने तथा सेना के व्यय को कम करने के संबंध में उन्होंने आयोग के समक्ष जो तर्क प्रस्तुत किये उससे अत्यंत ही प्रभावित हुआ।

गोखले विधायक के रूप में

1899 ई. में वे बंबई व्यवस्थापिका के लिए प्रदेश के केन्द्रीय क्षेत्र की नगरपालिकाओं के प्रतिनिधि चुने गये। विधायक के रूप में उन्होंने सरकार की भू-राजस्व नीति की आलोचना की और भूमि हस्तांतरण अधिनियम को सरकारी बहुमत से पारित किये जाने के विरोध में अन्य चुने हुए सदस्यों के साथ परिषद् से बहिर्गमन किया।

उन्होंने जिला नगरपालिका अधिनियम में संशोधन के प्रस्ताव का भी विरोध किया तथा उसकी कमियों को दूर करने के लिए सुझाव दिए। 1902 ई. में वे केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद् के सदस्य चुने गये।

अनेक सार्वजनिक हितों एवं समस्याओं पर गोखले ने अपने विचारों से भारत में ब्रिटिश शासन का मार्गदर्शन किया। बजट पर होने वाली बहस में उनके भाषणों का विशेष महत्त्व माना जाता था। उन्हें न केवल सदस्यों द्वारा बल्कि शासकों द्वारा भी ध्यान से सुना जाता था। लार्ड कर्जन (Lord curzon)के प्रतिक्रियावादी सुधारों का गोखले ने तीव्र विरोध किया, फिर भी कर्जन ने गोखले की विधायी प्रतिभा की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हुए कहा, ईश्वर ने आपको असाधारण योग्यता दी है और आपने इसको बिना किसी शर्त के देश सेवा में लगा दिया है।

गोखले की सफलता का रहस्य उनकी भाषण-शैली , तथ्यों का चयन,मृदुभाषिता एवं विचारों की सौम्यता थी। गोखले का अर्थशास्त्र संबंधी गहन ज्ञान था। वे भारतीयों के द्वारा राष्ट्रीय वित्त पर नियंत्रण रखे जाने के पक्ष में थे। इंग्लैण्ड में प्रवास के दौरान गोखले को पूना के पत्रकारों द्वारा सूचना प्राप्त हुई कि बंबई प्रशासन में प्लेग की रोकथाम के लिए जो कदम उठाये, उससे जनमत क्रुद्ध हो उठा है तथा पूना में दो अंग्रेज अधिकारियों की हत्या कर दी है।

पूना से मिली सूचना के आधार पर गोखले ने इंग्लैण्ड में वक्तव्य दिया कि प्लेग की रोकथाम के दौरान गोरे सिपाहियों ने भारतीय महिलाओं का शील भंग किया जिससे उन महिलाओं ने आत्महत्या करली।

गोखले के इस वक्तव्य से ब्रिटिश संसद में सरकार पर प्रश्नों की बौछार शुरू हो गयी।किन्तु बंबई सरकार ने इस खबर को निराधार पाया। इस पर उन्होंने तुरंत बंबई के गवर्नर से लिखित क्षमायाचना की। इस पर गोखले के विरोधियों ने इनकी तीव्र आलोचना की। किन्तु गोखले ने क्षमायाचना से स्पष्टवादिता,सत्यनिष्ठा और निर्भीकता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।

भारत सेवक समाज की स्थापना

गोखले भारत के राजनीतिक तथा सार्वजनिक जीवन में ऐसे कार्यकर्त्ता तैयार करना चाहते थे जो धर्मनिष्ठ होकर जन सेवा का कार्य कर सकें। अतः गोखले ने 1905 ई. में भारत सेवक समाज की स्थापना कर देशभक्तों का एक संगठन तैयार किया।

इस संगठन के उद्देश्य भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासन की प्राप्त,भारत तथा ब्रिटेन के संबंधों की अनिवार्यता,भारत में ब्रिटिश शासन ईश्वर के वरदान के रूप में स्वीकारोक्ति आदि थे।जनता के राजनीतिक शिक्षण, विभिन्न समुदायों में प्रेम एवं सहिष्णुता, स्त्रियों तथा दलितों की शिक्षा का विस्तार,वैज्ञानिक एवं औद्योगिक शिक्षा का प्रचार,भारत में औद्योगिक विकास के लिए प्रयत्न तथा संवैधानिक पद्धति से राष्ट्रीय हितों का संरक्षण आदि इस सोसाइटी के मुख्य कार्य थे।

1905 ई. में गोखले काँग्रेस प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में लाला लाजपतराय(Lala Lajpat Rai) के साथ इंग्लैण्ड गये, जहाँ ब्रिटेन की जनता को भारतीय हितों से अवगत कराया। इंग्लैण्ड से लौटने पर गोखले ने 1906 ई. में काँग्रेस के बनारस-अधिवेशन की अध्यक्षता की।

तत्पश्चात् वे पुनः इंग्लैण्ड गये और भारत सचिव मॉर्ले से भारत में संवैधानिक सुधारों की माँग की। गोखले,तिलक,लाजपतराय,विपिनचंद्रपाल (Gokhale, Tilak, Lajpatrai, Vipinchandraparpal)के निष्क्रिय प्रतिरोध एवं स्वराज्य के कार्यक्रम को उचित नहीं मानते थे।

गोखले का उदारवाद 1905 ई. में बंगाल विभाजन (Partition of Bengal) के कारण आलोचना का विषय बना तथा 1907 ई. में सूरत काँग्रेस के उदारवादियों व उग्रवादियों के संघर्ष ने उग्रवादियों की लोकप्रियता बढा दी।

लेकिन 1908 ई. में सरकार के दमन-चक्र ने उग्रवादियों की लोकप्रियता क्षीण कर दी। गोखले चाहते थे कि काँग्रेस में पुनः उग्रवादियों के प्रभाव को रोकने तथा राजनीति में बढती हुी हिंसा को रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार को भारत के उदारवादियों के हाथ मजबूत करने चाहिए।

इसी दृष्टि से मॉर्ले-मिण्टो(Morley-minto) सुधारों की घोषणा हुई। किन्तु गोखले को इन सुधारों से बङी निराशा हुई। ब्रिटिश सरकार ने गोखले के कार्य-कलापों से प्रभावित होकर उन्हें लार्ड इजलिंगटन की अध्यक्षता में नियुक्त पब्लिक सर्विसेज कमीशन का सदस्य मनोनीत किया।

गोखले के जीवन के अंतिम दिन

1912 ई. में वे सुधारों की नई योजना लेकर इंग्लैण्ड गये। इंग्लैण्ड से लौटते समय वे दक्षिण अफ्रीका में बसे भारतयों पर लगाये गये पंजीयन नियम एवं विशेष कर को, वहाँ की सरकार ने समाप्त करने का आश्वासन दिया।1913 ई. में वे इजलिंगटन कमीशन की बैठक में भाग लेने इंग्लैण्ड गये, किन्तु अपने गिरते हुए स्वास्थ्य के कारण कमीशन का कार्य पूरा नहीं कर पाये और पुनः भारत लौट आये।

उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिन पूना में व्यतीत किये। बंबई के गवर्नर लार्ड वेलिंगडन ने उन्हें भारत में भावी सुधारों की योजना तथा भारतीयों को संतुष्ट करने वाली न्यूनतम सुधारों की योजना का सुझाव देने का आग्रह किया।

किन्तु अपनी अस्वस्थता के कारण वे पूना से बंबई नहीं जा सके। गोखले के आग्रह पर फिरोजशाह मेहता (Firozeshah mehta)और आगाखाँ पूना गये, वहाँ गोखले ने अपना अंतिम राजनीतिक वक्तव्य दिया जिसे गोखले का राजनीतिक वसीयतनामा कहा जाता है।

आगे चलकर उनका यही वसीयतनामा मांटेग्यूचेम्सफोर्ड सुधारों की योजना का प्रारूप बना। इन सुधारों का प्रारूप तैयार करने के दो दिन बाद ही 19 फरवरी,1915 को गोखले ने अपना शरीर त्याग दिया।

गोखले के राजनीतिक विचार

गोखले के सामाजिक विचार

गोखले के आर्थिक विचार

गोखले के शिक्षा संबंधी विचार

गोखले का मूल्यांकन-

काँग्रेस के उदारवादी नेताओं में गोखले एक प्रखर राजनीतिज्ञ थे। गोखले ने लाला लाजपतराय का निवेदिता से परिचय करवाया था।

निवेदिता भारत में क्रांतिकारी आंदोलन की नेता थी।राष्ट्रपति महात्मा गाँधी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।

बालगंगाधर तिलक जो गोपाल कृष्ण गोखले के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी थे, गोखले की मृत्यु पर उन्हें भारत रत्न कहकर उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

अतः हम कह सकते हैं कि गोखले एक व्यवहारिक राजनीतिज्ञ और उच्च कोटि के देशभक्त थे। वे एक ऐसे सच्चे देशभक्त थे कि वे अपने कट्टर विरोधी की अच्छाइयों की भी प्रशंसा करते थे।

Reference : http://www.indiaolddays.com

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