दिल्ली सल्तनत की प्रांतीय(इक्ता) व्यवस्था क्या थी

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सल्तनत काल में मानक प्रांतीय प्रशासन की स्थापना नहीं हो पायी थी। मानक प्रांतीय प्रशासन पहली बार अकबर के समय हुई थी।इस काल में प्रांतीय व्यवस्था व्यवस्थित तरीके से स्थापित नहीं हो पायी थी। इब्नबतूता के अनुसार परगने के नीचे 100 या 84 गाँवों का प्रमुख सदी कहलाता था इसका प्रमुख चौधरी था।

इब्नबतूता मुहम्मद बिन तुगलक के समय में भारत आया था।

बलबन ने पहली बार शिक की स्थापना करी उसका साम्राज्य शिकों में विभाजित था।

इब्नबतूता मुहम्मद बिन तुगलक के समय में 23 सूबों (प्रांत) की चर्चा करता है।

फिरोज तुगलक के समय में 55 परगनों की जानकारी मिलती है।

इक्ता व्यवस्था-

इस प्रणाली की विशेषतायें निम्नलिखित हैं-

  • इक्ता व्यवस्था की शुरुआत भारत से बाहर फारस(ईरान) क्षेत्र तथा पश्चिमि एशिया में हो चुकी थी।
  • भारत में पहली इक्ता मुहम्मद गौरी द्वारा कुतुबुद्दीन ऐबक को हाँसी ( हरियाणा) का क्षेत्र इक्ता के रूप में दिया गया पहला इक्ता था।
  • इसके कुछ समय बाद मुहम्मद गौरी द्वारा उच्छ (सिंध)का क्षेत्र इक्ता के रूप में  नासीरुद्दीन कुबाचा को दिया गया।
  • लेकिन प्रशासनिक रूप से इक्ता की स्थापना इल्तुतमिश द्वारा की गई।
  • इल्तुतमिश ने ‘इक्ता’ प्रणाली प्रारम्भ की इक्ता का अर्थ है – धन के स्थान पर तनख्वाह के रुप में भूमि प्रदान करना
  • इक्ता दो प्रकार की होती थी –

(i )बङी इक्ता- ऐसे क्षेत्र महत्त्वपूर्ण अमीरों व सेनाधिकारियों को दिये जाते थे। ये इक्तेदार इक्ता भूमि में राजस्व वसूली के साथ-2 सैनिक और प्रशासनिक कर्तव्य भी करते थे।

(ii)छोटी इक्ता- ये सामान्यतः वेतन के रूप में सैनिकों को प्रदान की जाती थी। इनसे संबंधित इक्तेदार केवल राजस्व वसूली करता था।

इक्ता प्रणाली की आवश्यकता-

  • इक्ता प्रणाली की शुरुआत आरंभिक तुर्की सुल्तानों की आवश्यकता से हुई। राजधानी से दूर स्थित सल्तनत के वे क्षेत्र जिनसे राजस्व वसूली आसानी से न होकर सुल्तान द्वारा इक्ता के रूप में दी जाने लगी। ये इक्तायें सुल्तान की प्रशासनिक और सैनिक सेवा करने के बदले प्रदान की जाती थी।

इस प्रकार सुल्तान द्वारा इक्तायें बांटकर सीमावर्ती क्षेत्रों में सल्तनत का प्रभाव स्थापित किया तथा नियमित रूप से राजस्व भी वसूला दूसरी तरफ संबंधित अधिकारी को अपने अधीन एक क्षेत्र मिला, जिसमें अपनी योग्यता के अनुरूप वह राजस्व प्राप्त कर सकता था।

इल्तुतमिश ने गंगा-यमुना दोआब में हिन्दू जमीदारों की शक्ति को तोङने के लिये शम्सी तुर्की अमीरों को 2000 इक्तायें बांटी।

इक्तेदार के कार्य-

इक्तेदार अपनी इक्ता में प्रशासनिक व सैनिक कार्यों को पूरा करता था।तथा इक्ता से प्राप्त राजस्व में से अपना वेतन तथा प्रशासनिक व सैनिक खर्च निकालकर शेष रकम को सुल्तान के राजकोष में जमा कराता था। इस शेष रकम को फवाजिल कहते थे।

इक्तेदार अपनी इक्ता में सुल्तान के नाम से शासन करता था, उसका पद वंशानुगत नहीं था। तथा इक्तेदार को सिक्के चलाने का अधिकार भी नहीं था।

इक्तेदार का पद हस्तांतरणीय होता था। समय-2 पर सुल्तान इक्तेदारों का स्थानांन्तरण करता था।( यहां पर इक्तेदार पर सुल्तान का अधिकार झलक रहा है ) इस प्रकार राजपूत कालीन सामंती पद्दति में सुल्तान का अपने इक्तेदारों पर अधिक नियंत्रण था।

फिरोज तुगलक ने इक्तेदार का पद वंशानुगत कर दिया था।

इक्तेदारी प्रणाली के दोष-

इक्तेदार सामान्यतः इक्ता की आय व खर्च में हेरा-फेरी कर भ्रष्टाचार करते थे। इसे रोकने के लिये तथा इक्तेदारों पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु अलग-2 सुल्तानों ने अलग-2 कदम उठाये जैसे-

  • बलबन ने ख्वाजा नामक अधिकारी नियुक्त किया, जो इक्ता भूमि की आय का आकलन करता था।
  • अलाउद्दीन ने इक्तेदारों के स्थानांन्तरण   पर बल दिया तथा 3 वर्ष से अधिक किसी इक्तेदार को एक इक्ते में नहीं रखा। इसके अलावा उसने इक्ता प्रणाली में केन्द्रीय प्रशासन के हस्तक्षेप को बढाया।
  • गयासुद्दीन तुगलक ने इक्तेदार की व्यक्तिगत आय तथा उसके अधीन सैनिकों का वेतन अलग-2 रूप से निर्धारित कराया। वसालत-ए-हश्म(सैनिकों के वेतन का रजिस्टर)
  • मुहम्मद बिन तुगलक ने इक्तेदारों पर अत्यधिक नियंत्रण लगाया उसने इक्तेदारों के समकक्ष इक्ता क्षेत्र में अमीर नामक अधिकारी को नियुक्त किया जो इक्ता का प्रशासन चलाता था, जबकि वसूली का अधिकार इक्तेदार के पास बने रहने दिया।
  • इसी प्रकार मुहम्मद बिन तुगलक ने इक्तेदार के अधीन सैनिकों को केन्द्रीय खजाने से नकद वेतन देने की घोषणा की ।
  • इस अत्यधिक नियंत्रण के कारण ही इक्तेदारों ने मुहम्मद बिन तुगलक के समय अनेक विद्रोह किये।

इक्तेदारी प्रणाली से संबंधित महत्त्वपूर्ण बातें जो परीक्षाओं में कई बार पूछी गई हैं-

  • फिरोज तुगलक के समय में इक्तेदारों का पद वंशानुगत कर दिया गया। वंशानुगत इसी के काल तक रहा। बाद में नहीं।
  • इक्तेदार या इक्ता प्रथा को प्रशासनिक रूप इल्तुतमिश ने दिया था, तथा उसने पद को स्थानांन्तरित रखा था।
  • लोदी काल में इक्तेदार को वजहदार कहा जाता  था।

Reference : http://www.indiaolddays.com

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