कश्मीर रियासत का भारत संघ में विलय कब हुआ

कश्मीर की समस्या शेष रियासतों से अलग थी। यहाँ की जनसंख्या का बहुसंख्यक भाग मुस्लिम धर्मी था, परंतु यहां का आनुवांशिक शासक एक हिन्दू राजा था।84,471 मर्गमील क्षेत्र में विस्तृत कश्मीर रियासत जिसकी जनसंख्या 1941 की जनगणना के अनुसार 40,21,615 थी- की 77.11% जनता मुसलमान 20.12% जनता हिन्दू तथा 2.77% जनता सिख एवं बौद्ध थी।

अगस्त 1947 में कश्मीर के शासक ने अपने विलय के विषय में कोई तात्कालिक निर्णय नहीं लिया। वह अपनी स्वतंत्र स्थिति बनाये रखना चाहता था, जबकि पाकिस्तान इसे अपने साथ मिलाना चाहता था।

सितंबर,1947 में पाकिस्तान द्वारा अत्यधिक दबाव डाले जाने पर कश्मीर ने पाकिस्तान के साथ एक अस्थायी समझौता कर लिया, परंतु कुछ समय बाद ही पाकिस्तान के व्यवहार से राजा हरिसिंह को अत्यधिक चिन्ता होने लगी। क्योंकि पाकिस्तान ने अस्थायी समझौते की शर्तों को पूरा नहीं किया तथा राजा पर दबाव डालने के लिए सीमा पर झगङा करना आरंभ कर दिया।

22 अक्टूबर, 1947 को उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत के कबायलियों एवं अनेक पाकिस्तानियों ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया, और चार दिनों के भीतर ही हमलावर श्रीनगर से 25 मील दूर बारामूला तक पहुँच गये।

इस परिस्थिति से घबराकर 24 अक्टूबर, 1947 को राजा हरिसिंह ने आक्रमणकारियों से अपने राज्य को बचाने के लिए भारत से सैनिक सहायता की मांग की और साथ ही कश्मीर को भारत संघ में सम्मिलित करने की प्रार्थना भी की।

26 अक्टूबर, 1947 को कश्मीर के मुख्यमंत्री मेहरचंद महाजन ने नेहरू से भेंट की, किन्तु नेहरू तब तक कश्मीर को सहायता देने के लिए सहमत नहीं हुए, जब तक कि राज्य के मुख्य राजनीतिक दल अखिल जम्मू एवं कश्मीर नेशनल कान्फ्रेस के नेता शेख अब्दुल्ला ने नेहरू को यह आश्वासन नहीं दे दिया, कि राज्य में संवैधानिक शासन की शर्त पर वह और उनका दल कश्मीर को भारत के साथ सम्मिलित किये जाने के पक्ष में है।

अन्ततः 26अक्टूबर, 1947 को एक अस्थायी संकटकालीन शासन का निर्माण किया गया और शेख अब्दुल्ला को इसका प्रधान नियुक्त किया गया।

1 जनवरी, 1948 को भारत सरकार ने सुरक्षा परिषद् से यह शिकायत की, कि पाकिस्तान से सहायता प्राप्त करके कबायलियों ने भारत संघ के एक अंग कश्मीर पर आक्रमण कर दिया है।जिससे अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो गया है।

दूसरी तरफ पाकिस्तान ने भी भारत पर आरोप लगाया कि कश्मीर का भारत में विलय अवैधानिक है।

अतः सुरक्षा परिषद ने अगस्त 1948 को इस समस्या के समाधान के लिए 5 राष्ट्रों – चेकास्लोवाकिया, अर्जेण्टीना, अमेरिका, कोलंबिया और बेल्जियम को सदस्य नियुक्त कर स्थिति का अवलोकन करके समझौता कराने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र आयोग की नियुक्ति की।

इस कमीशन ने 13 अगस्त 1948 को भारत एवं पाकिस्तान के बीच गोलाबारी बंद करने की संधि का सुझाव रखा।जिसे यद्यपि भारतीय संघ मान गया, किन्तु पाकिस्तान ने गोलाबारी जारी रखी।

इस मुद्दे को लेकर दोनों पक्ष एक लंबी वार्ता के बाद 1 जनवरी, 1949 को युद्ध-विराम के लिए इस शर्त पर सहमत हो गये, कि कश्मीर के विलय का अंतिम फैसला जनमत-संग्रह के माध्यम से किया जायेगा।

फलस्वरूप जनमत-संग्रह की शर्तों को पूरा करने के लिए एक अमेरिकी एडमिरल चेष्टर निमित्ज को संयुक्त राष्ट्र का प्रशासक नियुक्त किया गया। किन्तु अपने उद्देश्य में असफल होने जाने के फलस्वरूप उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।

इस पर अप्रैल 1950 में सुरक्षा परिषद ने संयुक्त राष्ट्र आयोग की जगह सर ओवेन डिक्सन को संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया, किन्तु वे भी असफल रहे।

इस पर सुरक्षा परिषद् ने 30 अप्रैल,1951 को डॉ. फ्रैंक ग्राहम को संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया, किन्तु उनके प्रयत्न भी निष्फल ही साबित हुए।

राज्य में संविधान निर्माण हेतु 1951 में जम्मू-कश्मीर संविधान सभा की बैठक शुरू हुई और फरवरी, 1954 में राज्य का भारत संघ में विलय संविधान सभा द्वारा पुष्टि कर दिया गया।

नवंबर, 1950 में इस संविधान सभा ने राज्य के लिये एक पृथक संविधान ग्रहण किया, जिससे जम्मू कश्मीर की स्थिति को भारतीय संघ की एक ईकाई के रूप में विधिवत् मान्यता मिल गयी।

26 जनवरी, 1957 को इस नये संविधान के लागू हो जाने के पश्चात् संविधान सभा ने अपने को भंग कर लिया। 26 जुलाई, 1957 को बख्शी गुलाम मुहम्मद को जम्मू एवं कश्मीर के प्रधानमंत्री (वजीर-ए-आजम) के रूप में शपथ दिलायी गयी तथा युवराज कर्ण सिंह को दूसरी अवधि के लिए निर्विरोध सदर-ए-रियासत (राष्ट्रपति) चुन लिया गया।

संयुक्त-राष्ट्र महासंघ के हस्तक्षेप के कारण 1 जनवरी, 1949 ई. को भारत एवं पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम लागू कर लिया गया था। पाकिस्तान ने कश्मीर के 78,114 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था, जो अभी तक बरकरार है। तथा पाकिस्तान के उस कब्जे वाले आजाद-कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद में स्थित है।

स्वतंत्रता के समय भारत के चंद्रनगर, पांडिचेरी, कारीकल, माही एवं येनम क्षेत्र फ्रांस के अधिकार में थे। फ्रांस ने 1950 ई. में भारत से रूठ करके चंद्रनगर को वापस कर दिया और शेष स्थानों को फ्रांस ने 1954 में भारत को सौंप दिया।

स्वतंत्रता के समय गोवा, दमन, द्वीव, दादर और नगर हवेली के भारतीय क्षेत्र पुर्तगाल के अधिकार में थे। इन क्षेत्रों को देने के इंकार करने के पश्चात् 1954 ई. में भारतीय सैनिकों ने दादर और नगर हवेली पर अधिकार कर लिया तथा 1961 ई. में इन क्षेत्रों को कानूनी तौर पर भारत में शामिल कर लिया गया।

17 दिसंबर,1961 ई. में गोवा संग्राम की उग्रता को देखते हुए भारत सरकार ने सैनिक कार्यवाही द्वारा गोवा, दमन एवं दीव पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार पुर्तगालियों ने भारत में सबसे पहले ( 1510 ई. में गोवा में) उपनिवेश स्थापति किये और सबसे अंत में ( 1961 ई.) भारत से गये।

1961 में गोवा, दमन तथा दीव की पुर्तगाली बस्तियों पर भारतीय प्रभुत्व स्थापित हो गया। और इस प्रकार भारत से साम्राज्य वाद का अंतिम अवशेष भी समाप्त हो गया।

इस प्रकार नवंबर,1949 तक भारत की लगभग सभी रियासतें भारत संघ में मिल चुकी थी। इन रियासतों में से अधिकांश के नाम भी बदल दिये गये तथा सभी राज्यों में प्रजातंत्रात्मक-व्यवस्था स्थापित की गयी।

इनके नरेशों में से अधिकांश को धन देकर शासन से अलग कर दिया गया तथा कुछ को राजप्रमुख का पद देकर उस राज्य के शासन का संवैधानिक प्रधान मात्र बना दिया गया। अब संपूर्ण भारत की शासन सीमाओं को समान रूप से लागू कर दिया गया।

नवीन संविधान लागू होने के अवसर पर भारत में चार प्रकार के राज्य थे। इसमें 10 राज्य (अ), 8 राज्य(ब), 10 राज्य (स), और 1 राज्य (द) श्रेणी के थे।

संविधान सभा ने 1948 में एस.के.दर के नेतृत्व में भाषाई राज्य आयोग की नियुक्ति की, और इस आयोग से भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की वांछनीयता का मूल्यांकन करने को कहा।

19 अक्टूबर, 1952 में विख्यात स्वतंत्रता सेनानी पोट्टी श्रीरामलू ने भाषाई आधार पर अलग आन्ध्र प्रदेश की मांग पर अनशन शुरू कर दिया और 50 दिनों के बाद उनकी मृत्यु हो गयी।

उनकी मृत्यु के बाद इस मांग को लेकर आंदोलन काफी उग्र रूप धारण कर लिया। अन्ततः मजबूर होकर 1953 में सरकार को अलग आंध्रप्रदेश राज्य की मान्यता देनी पङी।

इस प्रकार भाषाई आधार पर गठित होने वाला आंध्रप्रदेश देश का पहला राज्य बना।

राज्य पुनर्गठन आयोग

भाषाई समस्याओं को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने 22 दिसंबर, 1953 को एक राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना की। और जस्टिस मि. फजल अली को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया और पं. ह्रदयनाथ कुंजरू तथा सरदार के.एम.पन्निकर इसके सदस्य चुने गये।

इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट सितंबर, 1955 को भारत सरकार को सौंप दी। इस रिपोर्ट के आधार पर ही संसद ने नवंबर, 1956 में राज्य पुनर्गठन कानून ( अधिनियम ) बनाया गया। इस अधिनियम के द्वारा अ,ब,स,द श्रेणी के राज्यों के बीच के अंतर को समाप्त कर दिया गया तथा राजप्रमुख के पद को भी समाप्त कर दिया गया।

अब भारत को 14 राज्यों और 6 केन्द्रशासित ईकाइयों में बांट दिया गया। ये राज्य थे- जम्मू-कश्मीर, पूर्वी-बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, उङीसा, पं. बंगाल, असम, मद्रास, केरल, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, मैसूर और बंबई थे। जबकि दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, लक्षद्वीप, मणिपुर, त्रिपुरा और अंडमान निकोबार द्वीप समूह केन्द्रशासित ईकाइयां थी।

जम्मू-कश्मीर का ऐतिहासिक घटनाक्रम-

26 अक्टूबर, 1947 को राजा हरिसिंह द्वारा विलय पत्र पर हस्ताक्षर।

1 जनवरी, 1947 को भारत द्वारा कश्मीर विवाद संयुक्त-राष्ट्र सुरक्षा परिषद् को प्रेषित।

1 जून, 1949 को जम्मू-कश्मीर में यू.एन.ओ. की देखरेख में जनमत-संग्रह कराने का प्रस्ताव।

31 अक्टूबर 1951 को जम्मू-कश्मीर राज्य संविधान सभा अस्तित्व में आई।

15 नवम्बर,1952 को अनुच्छेद-370 के तहत सदर – ए- रियासत ( राष्ट्रपति ) एवं वजीर-ए-आजम (प्रधानमंत्री) पद को स्वीकार किया गया तथा कर्ण सिंह को सदर-ए-रियासत और शेख अब्दुल्ला को वजीर-ए-आजम बनाया गया।

10 फरवरी, 1954 को जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा द्वारा भारत में राज्य ( जम्मू-एवं कश्मीर ) के विलय की सहमति।

30 अक्टूबर, 1956 को भारतीय संविधान का अनुच्छेद-3 जम्मू-कश्मीर में प्रवर्तित।

17 नवंबर,1956 को संविधान सभा द्वारा राज्य का पृथक संविधान पारित।

26 जनवरी, 1957 को जम्मू-कश्मीर का नया संविधान लागू।

1960 में जम्मू-कश्मीर भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में आया।

30 मई, 1965 को 6वें संविधान संशोधन अधिनियम-1965 के द्वारा सदर-ए-रियासत ( राष्ट्रपति), वजीर-ए-आजम ( प्रधानमंत्री ) का पद समाप्त कर उसके स्थान पर क्रमशः राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री कर दिया गया। और मु. गुलाम सादिक ( कांग्रेस ) पहले मुख्य मंत्री बने।

Reference : http://www.indiaolddays.com

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