मराठा कालीन प्रशासनिक अधिकारी एवं सैन्य व्यवस्था

मराठों की सैन्य व्यवस्था

अन्य संबंधित महत्त्वपूर्ण तथ्य-

मराठा कालीन प्रशासनिक अधिकारी

  1. मजूमदार – आय-व्यय का निरीक्षण ।
  2. मिरासदार– जमींदार
  3. पाटिल या पटेल- ग्राम का मुखिया या मुख्य अधिकारी था।जो कर संबंधी न्यायिक तथा अन्य प्रशासनिक कार्य करता था।
  4. कुलकर्णी (लेखापाल)- भूमि का लेखा जोखा रखता था।
  5. चौगुले – पटेल का सहायक तथा कुलकर्णी के लेखे की देखभाल करता था।
  6. बारह वलूटे(शिल्पी)- ग्राम की औद्योगिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे।
  7. मामलतदार एवं कामविसदार –  ग्रामों में कर निर्धारण पटेल के परामर्श से करते थे।इसके अतिरिक्त ये जिले में पेशवा के प्रतिनिधि होते थे।
  8. देशमुख तथा देश पांडे(जिलाधिकारी)-मामलतदार के ऊपर नियंत्रण रखते थे।उनकी पुष्टि के बिना कोई लेखा स्वीकार नहीं किया जाता था।

मराठों की सैन्य व्यवस्था-

मराठा सेना का गठन मुगल सैन्य व्यवस्था पर आधारित था। मराठा सैन्य विनिमय दक्षिण के मुस्लिम राज्यों के अधिनियमों पर आधारित थे।पदातियों की अपेक्षा घुङसवारों पर अधिक बल दिया जाता था।

शिवाजी सामंतशाही सेना पर निर्भर नहीं थे तथा सेना को सीधे वेतन देना पसंद करते थे।पेशवा लोग सामंतशाही पद्धति पसंद करते थे तथा बहुत सा साम्राज्य जागीरों के रूप में बाँट दिया गया था।

मराठों के तोपखानों में मुख्यतः पुर्तगाली अथवा भारतीय ईसाई ही कार्य करते थे। कारखानों ने तोपखाना बनाने के लिए पूना तथा जुन्नार के अंबेगाव में अपने कारखानें स्थापित करवाये।

विदेशियों को सेना में भर्ती होने के लिए अधिक वेतन दिया जाता था।

टोन ने मराठा संविधान को सैनिक गणराज्य की संज्ञा दी है।

इतिहासकार स्मिथ ने शिवाजी के राज्य को डाकू राज्य की संज्ञा दी है।

Reference : http://www.indiaolddays.com

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