मुहम्मद गौरी का इतिहास (1173-1206 ई.)

मुहम्मद बिन कासिम के बाद महमूद गजनवी तथा उसके बाद मुहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण किया तथा कत्लेआम कर लूटपाट मचाई। भारत में तुर्क साम्राज्य का श्रेय मुहम्मद गौरी को दिया जाता है।

मुहम्मद गौरी गजनी तथा हेरात के मध्य स्थित एक छोटे से पहाङी क्षेत्र गजनी का शासक था।

12 वी शता. के मध्य में गोरी वंश का उदय हुआ।गोर वंश की नींव अला-उद-दीन जहांसोज ने रखी थी। जहांसोज की मृत्यु के बाद उसके पुत्र सैफ-उद-दीन गोरी के सिंहासन पर बैठा।

गोरी साम्राज्य का आधार उत्तर – पश्चिम अफगानिस्तान था। प्रारंभ में गोरी गजनी के अधीन था।

मुहम्मद गौरी शंसबनी वंश का था। मुहम्मद गौरी का पूरा नाम शिहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी था। ग्यासुद्दीन मुहम्मद गौरी इसका बङा भाई था। ग्यासुद्दीन मुहम्मद गौरी ने 1163 ई.में गोर को राजधानी बनाकर स्वतंत्र राज्य स्थापित करा।

1173 ई. में ग्यासुद्दीन ने अपने छोटे भाई मुहम्मद गौरी को गोर का क्षेत्र सौंप दिया तथा स्वयं गजनी पर अधिकार कर ख्वारिज्म के विरुद्ध संघर्ष शुरु कर दिया।

मुहम्मद गौरी ने भारत की ओर प्रस्थान कर दिया। महम्मद गौरी एक अफगान सेनापति था। यह एक महान विजेता तथा सैन्य संचालक भी था।

मुहम्मद गौरी के आक्रमण-

मुहम्मद गौरी के आक्रमण का उद्देश्य महमूद गजनवी के आक्रमणों से अलग था।

यह भारत में लूटपाट के साथ-साथ इस्लामी साम्राज्य के विस्तार का भी इच्छुक था। इसीलिए भारत में तुर्क साम्राज्य का संस्थापक मुहम्मद गौरी को ही माना जाता है।

गौरी ने प्रथम आक्रमण 1175 ई. में  मुल्तान पर किया । इस समय यहाँ पर शिया मत को मानने वाले करामाती शासन कर रहे थे। ये करामाती मुस्लिम बनने से पहले बौद्ध थे। गौरी ने मुल्तान को जीत लिया था।

गौरी ने 1178 ई. में द्वितीय आक्रमण गुजरात पर किया लेकिन मूलराज द्वितीय ने उसे आबू पर्वत की तलहटी में पराजित किया। भारत में मुहम्मद गौरी की यह पहली पराजय थी। इस युद्ध का संचालन नायिका देवी ने किया था जो मूलराज की पत्नी थी।

इस युद्ध से सबक लेते हुए गौरी ने पहले संपूर्ण पंजाब पर अपना अधिकार कर भारत पर अधिकार करने के लिये प्रयास शुरु किये।

1179-86 ई. के बीच पंजाब को जीत लिया था।

1179 में स्यालकोट पर अधिकार कर लिया ।

1186 ई. तक गौरी ने लाहौर, श्यालकोट तथा भटिण्डा (तबरहिंद) को जीत लिया था।तबरहिंद पर पृथ्वीराज चौहान तृतीय का अधिकार था। तबरहिंद पृथ्वीराज चौहान का सीमावर्ती क्षेत्र था। गौरी ने इस पर अधिकार किया था जिस वजह से गौरी व चौहान के बीच युद्ध होना अवश्यंभावी हो गया था।

तराइन का प्रथम युद्ध –

1191 ई. में तराइन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज तृतीय ने गौरी को पराजित किया लेकिन उसकी शक्ति को समाप्त नहीं कर सका।

तराइन का द्वितीय युद्ध-

1192 ई. में गौरी ने पृथ्वीराज तृतीय को हराकर अजमेर तथा दिल्ली तक के क्षेत्रों को जीत लिया तथा इसी के साथ चौहान साम्राज्य का नाश हुआ। तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज के सामंत  तथा दिल्ली के तोमर शासक गोविंदराज की मृत्यु हुई।

चंदबरदाई के अनुसार युद्ध में पराजय के बाद पृथ्वीराज तृतीय को बंदी बनाकर गजनी ले जाया गया। शब्दभेदी बाण छोङ कर मुहम्मद गौरी को मार दिया गया।

हसम निजामी के अनुसार  युद्ध में पराजित होने के बाद पृथ्वीराज ने अधीनता स्वीकार कर ली और गौरी ने उसे अजमेर में अपने अधीन रखकर  शासन करवाया। आगे गौरी के विरुद्ध विद्रोह करने की कोशिश की जिसमें पृथ्वीराज मारा गया।(अधिकांश विद्वान इसे ही स्वीकार करते हैं, जिसकी पुष्टि अजमेर से प्राप्त सिक्कों से होती है जिसमें एक तरफ घोङे की आकृति तथा मुहम्मद – बिन – साम लिखा है। तथा दूसरी तरफ बैल की आकृति बनी है एवं पृथ्वीराज लिखा हुआ है।

1192 ई. के बाद गौरी ने अपने दास ऐबक को भारतीय क्षेत्रों का प्रशासक घोषित कर दिया।

1194 ई. में गौरी ने ऐबक की सहायता से चंदावर (यू. पी. इटानगर) के युद्ध में कन्नौज के शासक जयचंद को पराजित कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया।

1194 ई. के बाद गौरी के दो सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक तथा बख्तियार खिलजी ने भारतीय क्षेत्रों को जीतना प्रारंभ किया।

बख्तियार खिलजी ने बिहार तथा बंगाल का पश्चिमी क्षेत्र सेन शासक लक्ष्मणसेन से जीता और इसी दौरान उसने नालंदा (बिहार) विश्व विद्यालय , विक्रमशिला(बंगाल) एवं ओदंतीपुर (बंगाल) विश्व विद्यालय को नष्ट कर दिया।

बख्तियार खिलजी को असम के माघ शासक ने पराजित किया तथा 1205 ई. में बख्तियार खिलजी के ही सैन्य अधिकारी अलिमर्दान ने मुहम्मद गौरी की हत्या कर दी।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1195 ई. में अन्हिलवाङा के शासक भीम द्वितीय पर आक्रमण किया लेकिन ऐबक पराजित हुआ।

ऐबक ने 1197 में अन्हिलवाङा पर फिर से आक्रमण किया और उसे लूट लिया भीम द्वितीय ने अधीनता स्वीकार नहीं की लेकिन लगातार युद्धों से उसकी आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी। अतः भीम की मृत्यु के बाद गुजरात में सोलंकी वंश के स्थान पर बघेल वंश की स्थापना हुई।

1203 ई. में ऐबक ने चंदेल शासक परमर्दिदेव से कालींजर को जीत लिया था।

मुहम्मद गौरी की मृत्यु-

1206 ई.में मुहम्मद गौरी ने पंजाब के खोखर जनजाति के विद्रोह को दबाने के लिये भारत पर अंतिम आक्रमण किया तथा इस अभियान के दौरान दमयक (पश्चिमि पाकिस्तान) के पास गौरी की हत्या कर दी गई। गौरी इस समय सिंध नदी के किनारे नमाज पढ रहा था।

गौरी ने अपनी मृत्यु से पूर्व ही अपने दासों को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था।

गौरी ने लक्ष्मी की आकृति वाले कुछ सिक्के चलाये थे।

गौरी की मृत्यु के बाद उसका साम्राज्य उसके तीन प्रमुख दासों में विभाजित हुआ।

  1. कुतुबुद्दीन ऐबक – भारतीय क्षेत्र। ऐबक ने दिल्ली को इस्लामी साम्राज्य का केन्द्र बनाया।
  2. ताजुद्दीन यल्दोज  – गजनी क्षेत्र।
  3. नासीरुद्दीन कुबाचा – उच्च तथा सिंध (पाकिस्तान)।

REFERENCE : http://www.indiaolddays.com

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