उदारवादी नेता

उदारवादी राष्ट्रीय आंदोलन (1885-1905)

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास है। यह संस्था प्रारंभ में अत्यंत नरम थी। आरंभ से ही कांग्रेस का दृष्टिकोण एवं आदर्श विशुद्ध राष्ट्रीय रहा। इसने कभी वर्ग विशेष के हित का समर्थन नहीं किया वरन् सभी प्रश्नों पर राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाया।

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गोखले के शिक्षा संबंधी विचार

गोपाल कृष्ण गोखले के शिक्षा संबंधी विचार क्या थे

गोखले ने अपना जीवन एक शिक्षक के रूप में आरंभ किया था, इसलिए उन्होंने समय-2 पर भारत की शिक्षा प्रणाली(education system) के संबंध में अपने विचार प्रकट किये थे।

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गोखले के आर्थिक विचार

गोपाल कृष्ण गोखले के आर्थिक विचार क्या थे

गोखले भारत के औद्योगिक विकास(industrial development) के लिए सदैव इच्छुक रहे। स्वदेशी वस्तुओं के प्रोत्साहन के समर्थक थे, किन्तु वे बहिष्कार की नीति द्वारा स्वदेशी का विस्तार हितकारी नहीं मानते …

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गोखले के सामाजिक विचार

गोपाल कृष्ण गोखले के सामाजिक विचार

यद्यपि गोखले ने तिलक की भाँति समाज सुधार आंदोलन में भाग नहीं लिया।किन्तु वे सच्चे समाज सुधारक थे।वे रूढिवादिता के प्रबल विरोधी थे।भारत में प्रचलित जाति व्यवस्था को वे प्रगति के मार्ग में बाधक मानते थे।दलित जातियों के उत्थान के वे प्रबल समर्थक थे। छुआछूत तथा भेदभाव का अंत करने के लिए गोखले ने भारतीयों को सामाजिक संकीर्णता से बाहर निकलने का आह्वान किया।

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गोखले के राजनीतिक विचार

गोपाल कृष्ण गोखले के राजनीतिक विचार

गोखले(Gokhale) के राजनीतिक विचारों पर 19वी. शता. के उदारवाद की स्पष्ट छाप मिलती है। गोखले ने भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस (Indian National Congress)में उदारवाद(Liberalism) का प्रसार किया। गोखले मानते थे कि भारत में अंग्रेजों का शासन ईश्वर की इच्छानुसार हुआ है और वह भारतीयों की भलाई के लिए हुआ है। उनका यह दृढ विश्वास था कि भारत में अंग्रेजी शासन भारतीय जनता को स्वशासन(Self government) की ओर प्रवृत्त करेगा और कालांतर में भारतयीय अपना प्रशासन चलाने के योग्य हो जायेंगे।

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गोपाल कृष्ण गोखले

गोपाल कृष्ण गोखले का जीवन परिचय (1866-1915)

गोपाल कृष्ण गोखले(Gopal Krishna Gokhale) भारत के राष्ट्र निर्माताओं में प्रथम श्रेणी के महान् व्यक्ति थे। वे भारतीय राजनीति के महान् उदारवादी नेता(Moderate leader), व्यावहारिक आदर्शवादी, उदार, बुद्धिजीवी और गाँधीजी के राजनीतिक गुरु थे, जिन्होंने अपने ज्ञान, उत्साह, त्याग और साहस से भारत में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार किया। वे काँग्रेस के सम्माननीय नेता थे और उन्होंने काँग्रेस की नींव मजबूत करने तथा काँग्रेस को राष्ट्रीय आंदोलन (National Movement)का केन्द्र-बिन्दु बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब एवं किसने की

1885 ई. तक भारतीयों में राजनीतिक चेतना का उद्भव हो चुका था,और सब राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने हेतु एक राष्ट्रीय संस्था की आवश्यकता अनुभव कर रहे थे। 1876 में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी (Surendranath Banerjee) ने इंडियन (Indian Association)एसोसियेशन नामक संस्था की स्थापना की। 28 से 30 सितंबर, 1883 में कलकत्ता के अल्बर्ट हॉल (Albert Hall)में इस संस्था का राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ, जिसमें उन सभी प्रश्नों पर विचार किया गया जो आगे चलकर आंदोलन की पृष्ठभूमि बन गये।

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मुद्रा व्यवस्था तथा बैंक व्यवस्था

ब्रिटिश काल में मुद्रा व्यवस्था तथा बैंक व्यवस्था कैसी थी

ब्रिटिश काल से पूर्व भारत में विनिमय प्रायः वस्तुओं के आदान-प्रदान से होता था। ईस्ट इंडिया कंपनी(East India Company) के समय भी कुछ समय तक भूमि का लगान प्रायः अनाज के माध्यम से ही चुकाया जाता रहा। किन्तु शीघ्र ही अंग्रेजों द्वारा मुद्रा के माध्यम से भुगतान की प्रथा लागू कर दी गयी।

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रेल निर्माण कार्य

ब्रिटिश काल में रेल निर्माण कार्य

विश्व के विभिन्न देशों की आर्थिक प्रगति में रेलों का भारी योगदान था। यातायात की सुविधा के बिना भारी वस्तुओं का एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना तथा बङे पैमाने पर उत्पादित वस्तुओं का एक व्यापार संभव नहीं था।

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अकाल

अंग्रेजों की अकाल के प्रति नीति

भारत कृषि प्रधान देश होने के कारण सदैव मानसून के हाथ का खिलौना रहा है। मानसून(Monsoon) के असफल होने पर न केवल फसल ही खराब होती है, बल्कि किसान को अपने पशुधन और हल से भी वंचित होना पङता है। तालाबों का पानी सूख जाता है और इनके कीचङ में नाना प्रकार के कीटाणु उत्पन्न हो जाते हैं, जिसका परिणाम होता है लाखों लोगों की मृत्यु।

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