मुगल सम्राट अकबर की धार्मिक नीति

अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य-

  1. अकबर के सैन्य अभियान एक नजर में
  2. अकबर की राजपूत नीति की व्याख्या कीजिए
  3. अकबर का साम्राज्य विस्तार कहाँ से कहाँ तक था
  4. मुगल सम्राट अकबर का जीवन परिचय
  5. आधुनिक भारतः मुगल साम्राज्य का पतन के कारण क्या थे

अकबर की धार्मिक नीति का मूल उद्देश्य –  सार्वभौमिक सहिष्णुता थी। इसे सुलहकुल की नीति अर्थात् सभी के साथ शांतिपूर्ण व्यवहार का सिद्धांत भी कहा जाता था।अकबर ने इस्लामी सिद्धांत के स्थान पर सुलहकुल की नीति अपनाई। अकबर के प्रारंभिक धार्मिक सिद्धांत विचारों पर उसके शिक्षक अब्दुल लतीफ तथा सूफी विचारधारा का काफी प्रभाव पङा था।

अकबर ने दार्शनिक एवं धर्मशास्त्रीय विषयों पर वाद-विवाद के लिए अपनी राजधानी फतेहपुर सीकरी में एक इबादतखाना (प्रार्थना-भवन) की स्थापना 1575ई. में करवाया।

अकबर द्वारा इबादतखाना बनवाने के पिछे इस्लाम धर्म के बारे में अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करने की लालसा थी। अकबर प्रारंभ में इबादतखाने में केवल इस्लाम धर्मोपदेशकों को ही आमंत्रित करता था। किन्तु बाद में उनके आचरण से दुखी होकर 1578ई. में सभी के विद्वानों को आमंत्रित करने लगा अर्थात् उसे धर्मसंसद बना दिया।

अकबर समस्त धार्मिक मामलों को अपने हाथों में लेने के लिए 1579ई. में महजरनामा या एक घोषणा पत्र जारी करवाया। जिसने उसे धर्म के मामलों में सर्वोच्च बना दिया। इस पर पाँच उलेमाओं या इस्लामी धर्मविदों के हस्ताक्षर थे।

महजर को स्मिथ और बूल्जले हेग ने अचूक आज्ञापत्र  कहा। महजर जारी होने के बाद अकबर ने सुल्तान-ए-आदिल या इमाम-ए-आदिल (न्यायप्रिय शासक) की उपाधि धारण की। इस दस्तावेज (मजहर) में उसे अमर-उल-मोमिनीन कहा गया है।

महजर नामक दस्तावेज का प्रारूप शेख मुबारक ने तैयार किया था,किन्तु से जारी करने की प्रेरणा शेख मुबारक एवं उसके दोनों पुत्रों अबुल फजल एवं फैजी द्वारा दी गयी थी।

अकबर ने उलेमाओं के विरोध को कम करने तथा राजत्व की गरिमा को बचाने के लिए महजरनामा नामक सिद्धांत की घोषणा की थी।

अकबर ने सभी धर्मों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए 1582ई. में  तौहीद-ए-इलाही ( दैवी एकेश्वरवाद) या दीन -ए -इलाही नामक एक नया धर्म प्रवर्तित किया।

तौहीद -ए-इलाही वास्तव में सूफी सर्वेश्वरवाद पर आधारित एक विचार पद्धति थी। जिसके प्रवर्तन की प्रेरणा मुख्य रूप से सुलहकुल या सार्वभौमिक सौहार्द्र से मिली थी।

इस नवीन सम्प्रदाय(दीन – ए -इलाही) का प्रधान पुरोहित अबुल-फजल था। हिन्दुओं में केवल महेशदास(उर्फ बीरबल) ने ही इसे स्वीकार किया था।

इस नवीन धर्म में दीक्षा के लिये इतवार का दिन निश्चित था।और इस दीक्षा के दौरान दीक्षित व्यक्ति को अकबर का प्रिय उद्घोष अल्लाह-उ-अकबर कहना पङता था।

जेस्सुइट लेखक बारटोली ने दीने-इलाही के बारे में कहा है- कि यह विभिन्न तत्वों का सम्मिश्रण था जो अंशतःमुहम्मद के कुरान, ब्राह्मणों के धर्मग्रंथों तथा एक हद तक ईशा मसीह की इंजील से लिए गये थे।

जबकि विन्सेन्ट स्मिथ के अनुसार-दीन-ए-इलाही अकबर की भूल का स्मारक था, बुद्धिमानी नहीं। 

अबुल फजल ने आइने अकबरी में लिखा है कि बादशाहत एक ऐसी किरण है जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड को प्रकाशित करने में सक्षम है। जिसे समसामयिक भाषा में कियां खुरा ( अलौकिक प्रकाशमंडल) कहा गया है।

दीन-ए-इलाही धर्म में दीक्षित शिष्य को चार चरणों अर्थात् चहारगाना-अ-इख्लास को पूरा करना होता था। ये चार चरण थे-जमान, सम्पत्ति, सम्मान और धर्म।

दीन-ए-इलाही की असफलता का मुख्य कारण तत्कालीन रूढिवादी परिस्थितियाँ थी।

अबुल फजल ने बादशाह अकबर में -आग,हवा,पानी एवं भूमि इन चार तत्वों के समावेश की बातें कहीं। जिसमें उन्होंने योद्धाओं की तुलना अग्नि से, शिल्पकारों एवं व्यापारियों की तुलना हवा से, विद्वानों की तुलना पानी से तथा किसानों की तुलना भूमि से की है।

सूफी मत में आस्था जताते हुए अकबर ने चिश्ती सम्प्रदाय को प्रश्रय दिया । वह शेख सलीम चिश्ती का परम भक्त था और उसी के माम पर ्पने बेटे का नाम सलीम रका।

अकबर ने 1583ई. में एक नये कौलेन्डर -इलाही संवत् को जारी किया।

महदवी विचारों से सहानुभूति रखने के कारण अकबर  को मुल्लाओं के भारी विरोध का सामना करना पङा।

अकबर ने प्रयाग और बनारस जैसे तीर्थस्थानों पर लगने वाले तीर्थयात्रा-कर को समाप्त कर दिया था।

बदायूँनी ने अकबर के इस्लाम विरोधी कार्यों की एक लंबी सूची तैयार की थी, जिसमें उसने कहा था कि 1580ई. में उसने मुसलमानों को दाढी बढाने की आज्ञा दी, हजयात्रा को बंद करा दिया तथा मुस्लिम त्योहारों एवं रोजों पर रोक लगा दी थी।

सूफी सर्वेश्वरवाद से संबंधित दो क्लासिकी ग्रंथ – जलालुद्दीन रूमी की मसनवी तथा हाफिज का दीवान अकबर की दो मनपसंद पुस्तकें थी।

1583ई. से पहले अकबर की मुद्राओं पर कलमा और खलीफाओं का विवरण अंकित होता था किन्तु 1583ई. के बाद उन पर सूर्य और चंद्रमा की महिमा का बखान करने वाले पद्य अंकित किये जाने लगे।



अकबर ने सभी धर्मों को महत्व दिया और विभिन्न धर्मों के विद्वानों को अपने इबादतखाने में आमंत्रित किया।

इबादतखाने में आमंत्रित धर्माचार्य-

  • हिन्दू धर्म- देवी एवं पुरूषोतम।
  • जैन धर्म- हरिविजय सरि, जिन चंद्र सूरि
  • पारसी धर्म- दस्तूर मेहर जी राणा।
  • ईसाई धर्म- एकाबीवा और मोंसेरात।

अकबर हिन्दूधर्म से सबसे अधिक प्रभावित था।

अकबर ने वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठल नाथ को गोकुल अवं जैतपुरा की जागीर दी ती।

अकबर ने जैन धर्म के आचार्य हरिविजय सूरि को जगतगुरू तथा जिनचंद्रसूरि को युग प्रधान की उपाधि दी थी।

अकबर ने पारसी धर्म के पुरोहित दस्तूर मेहर जी राणा को जीवन निर्वाह के लिए 200 बीघा जमान दी थी। तथा उसी के प्रभाव के कारण अपने दरबार में 24 घण्टे अग्नि प्रज्वलित करने का आदेश दिया।

अकबर ने झरोखा दर्शन  तुलादान, तथा पायबोस जैसी पारसी परंपराओं को आरंभ किया। 

अकबर ने सिक्खों के तीसरे गुरू अमरदास से भेंट की थी तथा उसकी पुत्री के नाम कई गाँव प्रदान किया।

अकबर ने सिखगुरू रामदास को 1577ई. में 500बीघा जमीन प्रदान की। जिसमें एक प्राकृतिक तालाब भी था। यहीं पर कालांतर में अमृतसर नगर बसा और स्वर्ण मंदिर का निर्माण कराया गया।

फतेहपुर सीकरी का खाका बहाउद्दीन ने तैयार करवाया था।

अकबर के दरबार में ईसाइयों का जेसुइट मिशन तीन बार आया था।

अकबर के दरबार में 1580ई. में (फतेहपुर सीकरी) आने वाले प्रथम जेस्सुइट का नेतृत्व फादर एकाबीवा ने किया था।

अकबर ने सती प्रथा को रोकने का प्रयास किया, विधवा विवाह को कानूनी मान्यता प्रदान की गयी, शराब की बिक्री पर रोक लगाया तथा लङके एवं लङकियों के विवाह की आयु 16और 14 वर्ष निर्धारित की।

Reference : http://www.indiaolddays.com

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