सल्तनत कालीन सैनिक संगठन, न्याय तथा दंड व्यवस्था

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सैनिक संगठन-

तुर्की प्रशासन व्यवस्था में सैनिक संगठन का विशेष महत्त्व था। सैन्य  संगठन मुख्यतः तुर्की और मंगोल पद्दति पर आधारित था। सल्तनत कालीन सुल्तानों में बलबन को सैन्य विभाग की स्थापना का तथा अलाउद्दीन खिलजी को एक स्थायी सेना के गठन का श्रेय दिया जाता है। सुल्तानों की सैनिक शक्ति उनके सैनिक बल पर निर्भर करती थी। अमीर, खान, मलिक ये सब उपाधियाँ सैनिक श्रेणियाँ थी।

सल्तनत कालीन सैन्य व्यवस्था का शुभारंभ इल्तुतमिश के शासन काल से होता है। उसके काल में सल्तनत की सेना को हश्म-ए-कल्ब ( केन्द्रीय सेना ) या कल्ब-ए-सुल्तानी कहा जाता था। इल्तुतमिश की सेना का संगठन गुलामों के रूप में भर्ती किये गये किसानों की शक्ति पर आधारित था। सेना को वेतन नकद नहीं दिया जाता था वरन् इसके बदले उन्हें अक्ता प्रदान की जाती थी।

इल्तुतमिश के काल में विभिन्न क्षेत्रों की सेनाऐं इन नामों से पुकारी जाती थी-

  • केन्द्रीय सेना – हश्म -ए – कल्ब या कल्ब – ए – सुल्तानी।
  • प्रान्तीय सेना- हश्म-ए-अतरफ
  • शाही घुङसवार-सवार -ए- कल्ब
  • सुल्तान की व्यक्तिगत सेना- शम्सी घुङसवार

सल्तनत की सैन्य व्यवस्था एवं सैनिक वर्गीकरण संबंधी व्यवस्था खिलजी वंश के उत्थान के साथ प्रारंभ होती है। तथा सल्तनत की सैन्य व्यवस्था का विधिवत प्रारंभ इसी युग (खिलजी युग ) से माना जाता है।

खिलजी काल से मंगोलों में प्रचलित सैनिक वर्गीकरण पद विषयक शब्द जैसे अमीरान-ए-सदा, अमीरान-ए-हजारा एवं अमीरान-ए-तुमन के उदाहरण मिलने लगते हैं। मंगोल सेना का यह वर्गीकरण दशमलव प्रणाली पर आधारित था और इसे सल्तनत कालीन सैन्य व्यवस्था में भी अपनाया गया।

मंगोल लङाकू सैनिक 10-10 सैनिक टुकङियों में बंटे हुए थे जैसे-

  • अमीर-ए-दह-दस सैनिकों का सेनानायक
  • अमीर-ए-सदा-दस अमीरों या सौ सैनिकों का सेनानायक
  • अमीर-ए-हजारा- एक हजार सैनिकों का सेनानायक
  • अमीर-ए-तुमन-दस हजार सैनिकों का सेनानायक

यह सैनिक वर्गीकरण पद सोपान सूचक होने के साथ-2 सैन्य व्यवस्था के अत्यधिक केन्दीभूत होने का आभास दिलाता है।

जियाउद्दीन बरनी ने इस सैन्य वर्गीकरण (दशमलव प्रणाली) को अपने ढंग से स्पष्ट किया है। उनके अनुसार सबसे छोटी सैनिक इकाई सरखेल तथा सबसे बङी सैनिक इकाई खान की थी। खान के ऊपर सुल्तान होता था। यह वर्गीकरण निम्न प्रकार है-

  • सरखेल- दस घुङसवारों की टिकङी की प्रधान
  • सिपहसालार- दस सरखेल (100घुङसवार)
  • अमीर- दस सिपहसालार ( 1000घुङसवार)
  • मलिक- दस अमीर ( 10,000 घुङसवार)
  • खान- दस मलिक ( 1,00,000 घुङसवार)
  • सुल्तान- दस खान ( सर्वोच्च सेनापति)

13वी. शताब्दी में सेना का सर्वोच्च अधिकारी मलिक होता था। खान एक आदरसूचक उपाधि होती थी। खान उच्चाधिकारी का सैन्य वर्गीकरण से कोई संबंध नहीं होता था।

सैनिक सुधारों की दृष्टि से अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल को सबसे महत्त्वपूर्ण युग कहा जाता है। उसने एक स्थायी सेना का गठन किया। सैनिकों की सीधी भर्ती की तथा उन्हें सरकारी खजाने से नकद वेतन भुगतान किया।

अलाउद्दीन खिलजी ने सैनिकों को अक्ता प्रदान करने की प्रथा को समाप्त कर दिया।एक घोङे रखने वाले अश्वारोही सैनिक का वार्षिक वेतन234 टंका निश्चित हुआ और दो-अस्पा सैनिकों को 78 टंका वार्षिक अतिरिक्त प्रदान किया जाता था।इसने घोङे को दागने की प्रथा प्रारंभ की, जिससे उसकी अदला-बदली न हो सके।

अलाउद्दीन के शासन काल के बाद मुक्ता लोग अपने सैनिकों के वेतन में से कुछ कमीशन काट लिया करते थे। गयासुद्दीन तुगलक ने केवल इस कुप्रथा को समाप्त ही नहीं किया वरन् सैनिकों के वेतन रजिस्टर (वसीलात-ए-हश्म) की स्वयं जाँच करने लगा।अलाउद्दीन की सैन्य व्यवस्था खुसरव शाह के समय में टूटकर बिखर गयी। इसने किराये पर सैनिकों की भर्ती की।

मुहम्मद बिन तुगलक के समय में सैनिक अधिकारियों और उनके अधीनस्थ सैनिकों के वेतन का विवरण हमें पहली बार मिलता है।मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में मुक्ता और सेनाध्यक्षों से राजस्व वसूल करने का अधिकार छीनकर प्रान्तों में शिकदार और फौजदार नामक दो अधिकारियों को दे दिया गया।सैन्य विभाग (दीवान-ए-अर्ज) का प्रधान आरिज-ए-मुमालिक कहलाता था। भारत में आरिज के विभाग की स्थापना का सबसे पहले बलबन ने की थी।

दुर्ग ( किलों ) को सैनिक सुरक्षा का महान स्तंभ माना जाता था। प्रत्येक दुर्ग का एक दुर्गपाल होता था, जिसे सामान्यतया कोतवाल कहा जाता था। इल्तुतमिश ने सैनिकों को वेतन के तौर पर इक्ता प्रदान करने की प्रथा आरंभ की।

लोदी काल में अफगानों की प्रजातंत्रात्मक मनोवृत्ति के कारण सेना का स्वरूप बदल गया तथा वह जनजातीय लङाकू सेना हो गई।वे सैनिक जो सुल्तानों के रूप में भर्ती किये जाते थे खासखेल कहलाते थे। इनमें शाही अंगरक्षक गुलाम आदि होते थे।

सेना के मुख्य तीन भाग थे-

  1. घुङसवार सेना
  2. गज सेना
  3. पैदल सेना



न्याय एवं दण्ड व्यवस्था-

मुस्लिम कानून के चार स्त्रोत हैं-

इस्लामी कानूनों की व्यवस्था करने वाले विधिवेत्ता मुजदहीद अथवा विधि शास्त्री कहलाते हैं।

  1. कुरान- यह मुस्लिम कानूनों का प्रमुख स्त्रोत है।
  2. हदीस- इसमें पैगंबर के कथनों एवं कार्यों का उल्लेख है।
  3. इजमा- मुजतहिद द्वारा व्याख्या किया गया कानून अल्लाह की इच्छा का ही रूप माना जाता है। कानून के इस स्त्रोत को इजमा कहा जाता है।
  4. कयास- तर्क अथवा विश्लेषण के आधार पर कानून की व्याख्या।

ये चार कानून तो मुख्य होते थे, इनके अलावा भी कानून बने हुये थे, जो इस प्रकार हैं-

  • सामान्य कानून- ये कानून केवल मुस्लमानों  के ऊपर ही लागू होते थे।परंतु व्यापार आदि के मामले में मुस्लमानों तथा गैर मुस्लमानों दोनों पर समान रूप से लागू होते थे।
  • देश का कानून- देश का कानून स्थानीय कानून होता था तथा उसका आदर किया जाता था।
  • फौजदारी कानून- यह कानून हिन्दू एवं मुस्लमान दोनों के लिए बराबर था।
  • गैर मुस्लमानों का व्यक्तिगत तथा धार्मिक कानून- सुल्तान हिन्दुओं के सामाजिक मामलों में न्यूनतम हस्तक्षेप करते थे। और उनके मुकदमों का निर्णय उनकी अपने में विद्वान पंडित तथा ब्राह्मणों द्वारा किया जाता था।
  • दिल्ली सुल्तान मुकदमों का निर्णय काजियों और मुफ्तियों की सहायता से करता था।प्रांतीय गवर्नर भी इसे के अनुरूप न्याय करते थे। काजी एवं मुफ्ती का पद वंशानुगत होता था।

अधिकारी-

  • काजी-ए-सूबा- दीवानी फौजदारी विभाग का अधिकारी
  • दीवान-ए-सूबा- राजस्व मामले
  • फिकह- इस्लामी धर्मशास्त्र

Reference : http://www.indiaolddays.com

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