मराठों की आय के स्रोत-शिवाजी का राजस्व प्रशासन

शिवाजी का राजस्व प्रशासन

अन्य संबंधित महत्त्वपूर्ण तथ्य-

पेशवा के शासन काल के दौरान राज्य के राजस्व के मुख्य स्रोत थे-

  1. भू-राजस्व
  2. विविध कर।

विविधकर –

गृह कर, कूप सिंचित भूमि कर, सीमा शुल्क, माप और तौल के परीक्षण के लिए वार्षिक शुल्क आदि,विधवाओं के पुनर्विवाह पर कर आदि।

पेशवाओं ने विधवा के पुनर्विवाह पर पतदाम नामक कर लगाया।

राज्य की आय के अन्य स्रोत चौथ (25प्रतिशत)तथा सरदेशमुखी(10प्रतिशत)थी जो उन प्रदेशों को देनी पङती थी जो मराठों के अधीन आ जाते थे।

चौथ की आय का बँटवारा – बबती अर्थात् 1/4 भाग राजा के लिए सहोत्रा अथवा 6प्रतिशत पंत सचिव के लिए, नाडगुंडा अथवा 3 प्रतिशत राजा की इच्छा पर निर्भर करता था।तथा शेष मोकास अथवा 66प्रतिशत  मराठा सरदारों को घुङसवार रखने के लिए दिया जाता था।

सरदेशमुखी भी चौथ की तरह था, लेकिन जब यह प्रदेश सीधा मराठा साम्राज्य में विलय कर लिया जाता था तो 66प्रतिशत (मोकासा) जागीर के रूप में बाँट दिया जाता था।

कर्जापट्टी अथवा जस्ती पट्टी जमीदारों पर लगने वाला असाधारण कर था।

मराठों का भू-राजस्व-

भूमि कर राज्य की आय का मुख्य साधन था।शिवाजी खेत की वास्तविक उपज का भाग लेना पसंद करते थे परंतु पेशवाओं के काल में यह लंबी अवधि के लिए निश्चित कर दिया जाता था।

कृषक नई भूमि जोतने की प्रेरणा देने के लिए उस पर कर कम होता था।

पेशवा माधवराव ने बंजर तथा पथरीली भूमि को जोतने पर आज्ञा दी कि ऐसी भूमि का आधा भाग ईनाम के रूप में किसान को दिया जायेगा।

कर लगाने तथा एकत्रित करने की व्यवस्था में कर दाता को संरक्षण मिलता था।कर वसूली का अधिकार नीलामी (इजारा) कर दिया गया।

कामविसदार चौथ वसूल करते थे तथा गुमाश्ता सरदेशमुखी की वसूली करते थे।

सरदेशमुखी पूर्णतः राजा के हिस्से में होती थी और इसकी उगाही सीधे काश्तकारों से ही की जाती थी।

राजस्थान में मराठों ने चौथ सरदेशमुखी की वसूली की माँग नहीं की।यहाँ के राजाओं पर खानदानी तथा मामलत(खराज) लगाया जाता था।केवल अजमेर ही सुरक्षात्मक उद्देश्य के कारण मराठों के प्रत्यक्ष नियंत्रण में था।

मीरासदार(जमीदार)-वे काश्तकार थे जिनकी अपनी भूमि होती थी तथा उत्पादन के साधनों जैसे-हल,बैल आदि पर अधिकार होता था। मीरासदारों को संभवतः कर विमुक्त भूमि प्राप्त थी। शिवाजी के काल में मीरासदारों की स्थिति सामान्य किसानों के समकक्ष  हो गई।

उपरिस बटाईदार थे, जिन्हें कभी भी बेदखल किया जा सकता था। वे पेशवा के जिलाधिकारियों की अनुमति से और उनकी देखरेख में कृषि करते थे।

मीरास पट्टी या सिंहासन पट्टी मराठा काल में एक उपकर था।

राजाराम तथा शाहू के अंतर्गत राज्य प्रमुख अधिकारियों के पद व्यवहारतः वंशानुगत हो गये।अधिकारियों को जो भूमि पहले मोकासा(भूमि अनुदान) तथा सरंजाम के तौर पर दी जाती थी।वह पेशवा काल में वंशानुगत बन गई थी तथा उसे जागीर कहा जाने लगा था।

प्रारंभ में जागीर तथा मोकासा वंशानुगत श्रेणी में नहीं थे।किन्तु 17वी. शता.के बाद ये दोनों ही अनुदान वंशानुगत हो गये।

बरगीर सरदारों की सेना के निर्वाह का मुख्य साधन शत्रु इलाकों में लूटमार करना था।वतनदार वंशानुगत आधार पर तथा सरदार राज्य की ओर से भूमि व भू-राजस्व के नियंत्रण में समान रूप से भागी थे।

Reference : http://www.indiaolddays.com

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