दादाभाई नौरोजा का धन निष्कासन का(dhan ka nishkaasan) सिद्धांत क्या था

18 वी. शता.में इंग्लैण्ड (England)के उद्योगों को सुरक्षित रखने की दृष्टि से भारत में बनी वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंद लगा दिया गया था। किन्तु 19 वी. शता. में अंग्रेजों के व्यापार का स्वरूप बदल गया। 1813 ई. को चार्टर एक्ट द्वारा इंग्लैण्ड के निजी व्यापारियों को भी भारत से व्यापार करने की छूट प्रदान कर दी गई। इसका परिणाम यह हुआ कि इंग्लैण्ड में निर्मित माल का भारत में आयात बढ गया तथा भारत में निर्मित वस्त्रों एवं कुटीर उद्योगों की वस्तुओं के निर्यात में भारी कमी आ गई।

अब इसके स्थान पर भारत से कच्चे माल का निर्यात बढने लगा। इससे न केवल भारत औद्योगिक विकास (industrial development)में पिछङता गया बल्कि भारतीय उद्योगों का विनाश भी प्रारंभ हो गया। फलस्वरूप भारत में निर्धनता बढने लगी। भारत की बढती हुई इस निर्धनता का एक प्रमुख कारण भारत से धन का निष्कासन था।

धन निष्कासन का अर्थ

भारतीय अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश शासन का सर्वाधिक घातक प्रभाव भारतीय पूँजी और वस्तुओं का भारत से बाहर इंग्लैण्ड जाना और उसके बदले में भारत को कुछ भी प्राप्त नहीं होना था। इस प्रकार वह धन जो भारत से बाहर चला जा रहा था और जिस के बदले में भारत को कुछ भी प्राप्त नहीं होता था, वह धन का निष्कासन कहलाता था। यह धन का निष्कासन धातु मुद्रा के रूप में कम तथा वस्तुओं के व्यापार के रूप में अधिक होता था। अंग्रेज भारत से जितना राजस्व प्राप्त करते थे, उस धन से वस्तुएँ खरीद कर बाहर भेज देते थे, उन वस्तुओं के बदले में कोई अन्य वस्तु या धातु मुद्रा प्राप्त नहीं होती थी।

सोने-चाँदी को भारत से इंग्लैण्ड ले जाना इस धन के निष्कासन का बहुत छोटा अंश था। अंग्रेज अधिकारियों द्वारा अपनी समस्त बचत को इंग्लैण्ड भेजना, अंग्रेजों द्वारा केवल इंग्लैण्ड की वस्तुएँ ही खरीदना,भारत में रेल लाइनों का निर्माण तथा अन्य सार्वजनिक कार्यों के लिए धन व ब्याज चुकाना और मुद्रा परिवर्तन का घाटा भी धन का निष्कासन था। जो धन भारत से निष्कासित हो जाता, वही निष्कासित धन सार्वजनिक ऋण के रूप में पुनः भारत आ जाता था, जिसे चुकाने के लिए ब्याज सहित अधिक धन निष्कासित करना पङता था।

अतः ब्रिटिश साम्राज्य का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सबसे घातक प्रभाव धन का निष्कासन था। इसका अनुमान हम इस बात से लगा सकते हैं कि अंग्रेजों से पहले जितने भी शासक भारत में रहे, उन्होंने चाहे लोगों पर कितने ही अत्याचार क्यों न किये हों, चाहे भारतीयों से अधिक से अधिक राजस्व प्राप्त करने की चेष्टा की हो, किन्तु देश का धन अंततः देश में ही रहा। किन्तु भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना के साथ ही देश का धन बाहर जाने लगा।

धन निष्कासन की मात्रा

भारत से धन निष्कासन कितनी मात्रा में होता था, इस संबंध में विद्वानों ने अलग-2 आंकङे दिये हैं।जार्ज विन्गेट का अनुमान था कि 1834 ई. से 1851 ई. तक 42लाख 21 हजार 611 पौंड प्रतिवर्ष धन का निष्कासन होता था।

विलियम डिग्बी के अनुमानानुसार 1757 ई. से 1815 ई. तक यह राशि एक हजार मिलियन पौंड थी।दादाभाई नौरोजी, जी.वी. जोशी और आर.सी.दत्त जैसे भारतीय राष्ट्रवादियों ने 1883ई. से 1892 ई. तक के दस वर्षों में यह राशि 359 करोङ बतायी है।

धन-निष्कासन का स्वरूप-

जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में व्यापार करना आरंभ किया तब से उसे हमेशा एक समस्या उलझाती रही, वह यह कि भारत से इंग्लैण्ड विकास की जिस व्यवस्था में था, उसमें कोई वस्तु ऐसी नहीं थी जिसकी तुलना उत्तमता एवं तकनीकि दृष्टि से भारत में निर्मित वस्तुओं से की जा सके। यद्यपि उनका ऊनी कपङे का उद्योग काफी विस्तृत था, लेकिन भारत में ऊनी कपङे की माँग नहीं थी। इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत से माल खरीदने के लिए इंग्लैण्ड से सोना और चाँदी भारत में लाना पङता था।

कंपनी का शुरू से ही यह प्रयास रहा कि किसी न किसी युक्ति से भारत को बिना कुछ दिये अथवा कम राशि देकर भारत से वस्तुएँ ले जा सके। प्रारंभ में उनका विचार था कि अन्य उपनिवेशों से माल कमाकर भारत लाये और उस माल के बदले भारत में चीजें खरीदे।

लेकिन कंपनी को, बिना कुछ दिये भारत से माल ले जाने का सुअवसर प्लासी के युद्ध के बाद मिला। लार्ड क्लाइव ने स्वयं स्वीकार किया था कि यह एक ऐसा समय था जब कंपनी और उसके कर्मचारी कंपनी के भविष्य की ओर ध्यान दिये बिना व्यक्तिगत उपहार लेने के अतिरिक्त कुछ नहीं सोचते थे।

कंपनी ने भारत को न केवल व्यापार के क्षेत्र में ही लूटना आरंभ किया वरन् अपनी इच्छानुसार नरेशों को गद्दी पर बैठाकर उनसे नजराना और उपहार लेने शुरू किये। प्लासी के युद्ध के बाद जब मीर जाफर बंगाल का नवाब बना तब उसने न केवल कंपनी को बल्कि कंपनी के मुख्य अधिकारियों को भी बहुत-सा धन दिय़ा।

इसी प्रकार प्रत्येक प्रत्येक बार जब भी बंगाल में नया शासक गद्दी पर बैठता तो कंपनी और उपहार या नजाराना प्राप्त होता था। लेकिन लुटेरी कंपनी केवल उपहार लेकर ही संतुष्ट कैसे हो सकती थी। उसने व्यापार में भी बल प्रयोग करना शुरू किया।

विवश होकर 1762 ई. में बंगाल के नवाब ने ब्रिटिश गवर्नर को लिखा कि, ये रैय्यतों, व्यापारियों आदि को मार-पीटकर तथा उनका दमन करके अपनी एक रुपये की चीज 5 रुपये में बेच रहे हैं। इस प्रकार प्लासी के युद्ध के बाद कंपनी ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी कि वह एक औंस भी सोना दिये बिना संपूर्ण भारत का व्यापार करने में सफल हुई।

इस प्रकार अंग्रेज जब पहले-पहल भारत में व्यापार के लिए आये तब उनका उद्देश्य था- भारत द्वारा निर्मित वस्तुओं को उन देशों तक पहुँचाना जहाँ उनकी बहुत माँग था। किन्तु धीरे-2 ये व्यापारी इस व्यापार के स्वरूप में एक ऐसा मौलिक पिरवर्तन लाए कि व्यापार की दिशा ही बदल गई।

भारत, जो किसी समय सभी देशों को वस्तुएँ निर्यात करने वाला एक महान् देश समझा जाता था, अब स्वयं एक कृषक उपनिवेश बनकर रह गया।जिसका काम था इंग्लैण्ड के उद्योगों के लिए कच्चा माल अंग्रेजों को देना और उस कच्चे माल से बनी वस्तुओं के लिए एक मंडी का काम करना।

Reference :http://www.indiaolddays.com

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