भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब एवं किसने की

1885 ई. तक भारतीयों में राजनीतिक चेतना का उद्भव हो चुका था,और सब राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने हेतु एक राष्ट्रीय संस्था की आवश्यकता अनुभव कर रहे थे। 1876 में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी (Surendranath Banerjee) ने इंडियन (Indian Association)एसोसियेशन नामक संस्था की स्थापना की। 28 से 30 सितंबर, 1883 में कलकत्ता के अल्बर्ट हॉल (Albert Hall)में इस संस्था का राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ, जिसमें उन सभी प्रश्नों पर विचार किया गया जो आगे चलकर आंदोलन की पृष्ठभूमि बन गये।

1884 में कलकत्ता में एक अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी हुई, जहाँ एकत्र हुए भारतीय नेताओं ने एक अखिल राष्ट्रीय आंदोलन ठोस आधार पर संगठित करने पर बल दिया।तत्पश्चात् विभिन्न प्रांतों में क्षेत्रीय संस्थाओं का निर्माण हुआ।

1884 में बंगाल में नेशनल लीग की स्थापना हुई। इसी वर्ष मद्रास महाजन सभा(Madras Mahajan Sabha) की स्थापना हुई। जनवरी,1885 में बंबई प्रेसीडेन्सी एसोसियेशन(Bombay Presidency Association) की स्थापना की गई।इन समस्त संस्थाओं का कार्यक्षेत्र प्रांतों तक सीमित था, किन्तु इन संस्थाओं ने कांग्रेस की स्थापना की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। दिसंबर,1884 में अड्यार नगर में थियोसॉफिकल सोसायटी (Theosophical Society)के वार्षिक अधिवेशन के उपरांत 17 व्यक्ति, जो देश के विभिन्न भागों से आये थे, दीवान बहादुर रघुनाथ राव के निवास स्थान पर एकत्र हुऐ।

इस बैठक में एक देशव्यापी संगठन स्थापित करने का निश्चय किया गया, जिसके फलस्वरूप इंडियन नेशनल यूनियन (Indian National Union)नामक एक संस्था की स्थापना की गई।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का श्रेय एलन ओक्टोवियन ह्यूम(Alan Octavian Hume) को दिया जाता है। ह्यूम एक अंग्रेज सरकारी अधिकारी था। 1879 में नीति संबंधी मतभेद होने के कारण लार्ड लिटन(Lord Lytton) ने उसकी पदावनति कर दी थी।इस घटना ने उसे राजनीतिक आंदोलनकारी बना दिया।

मार्च, 1883 में उसने कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों के नाम एक खुला पत्र लिखा, उसमें उन्हें संगठित होकर भारतीय कल्याण के लिए कार्य करने की प्रेरणा दी। ह्यूम अक अनुभवी एवं दूरदर्शी व्यक्ति था। ह्यूम जानता था कि भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध घोर असंतोष है और इस असंतोष का भयंकर विस्फोट हो सकता है।

अतः वह भारतीयों की क्रांतिकारी भावनाओं को वैधानिक प्रवाह में परिणित करने के लिए अखिल भारतीय संगठन की स्थापना चाहता था। 1884 के अंत में ह्यूम बंबई गया तथा महाराष्ट्र व मद्रास के नेताओं से विचार-विमर्श करने के बाद मार्च, 1885 में एक राष्ट्रीय संगठन की योजना तैयार की।

मार्च व अप्रैल में उसने बंगाल व उत्तरी भारत का दौरा किया। मई,1885 में उसने प्रस्तावित संगठन के बारे में लार्ड डफरिन(Lord Dufferin) से चर्चा की तथा बंबई के गवर्नर को अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव किया। लार्ड डफरिन ने राष्ट्रीय संगठन के बारे में अपनी सहमति प्रकट करते हुए कहा कि, भारत में ऐसी कोई संस्था नहीं है, जो इंग्लैण्ड के विरोधी दल की भाँति यहाँ भी कार्य कर सके और सरकार को यह बता सके कि शासन में क्या त्रुटियाँ हैं और उनको कैसे दूर किया जा सकता है।

बंबई के गवर्नर को अध्यक्ष बनाने के संबंध में डफरिन ने कहा, गवर्नर को ऐसी संस्थाओं की अध्यक्षता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि गवर्नर की उपस्थिति में लोग अपने विचार स्वतंत्रतापूर्वक प्रकट नहीं कर सकेंगे। इस विचार विमर्श के बाद मई, 1885 में पहला परिपत्र जारी किया गया, जिसके द्वारा दिसंबर के अंतिम सप्ताह में देश के सभी भागों के प्रतिनिधियों की एक सभा पूना में बुलाई गई। इस परिपत्र में इस सभा के दो उद्देश्य बताये गये-

  1. राष्ट्र की प्रगति के कार्य में लगे लोगों का एक-दूसरे से परिचय
  2. इस वर्ष के लिए कौन-2 से कार्य किये जायें, उनकी चर्चा और निर्णय लेना।

इसके बाद 28 दिसंबर 1885 ई. में कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन के साथ ही राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हो गई।

पूना में प्लेग फैल जाने के कारण कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन (Congress first session) 28दिसंबर,1885 को उमेशचंद्र बनर्जी (Umesh Chandra Banerjee)की अध्यक्षता में बंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज (Gokuldas Tejpal Sanskrit College)के भवन में हुआ। इसमें देश के विभिन्न भागों से आये 72प्रतिनिधियों ने भाग लिया,कांग्रेस का जन्म भारत में ब्रिटिश शासन के शत्रु के रूप में नहीं अपितु मित्र के रूप में हुआ था। यह तो बाद में कटु अनुभवों का फल था कि राष्ट्रीय शक्तियों ने अहिंसात्मक आंदोलन का संगठन करके ब्रिटिश शासकों को भारत छोङने के लिए विवश कर दिया।

काँग्रेस का प्रथम अधिवेशन –

काँग्रेस का प्रथम अधिवेशन बंबई में 28 दिसंबर,1885 को प्रारंभ हुआ। इस अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण देते हुए उमेशचंद्र बनर्जी ने कांग्रेस के निम्नलिखित उद्देश्य बताये-

  • सारे भारतवर्ष में देश के हित में काम करने वाले लोगों का आपस में संपर्क बढाना और उनमें मित्रता की भावना उत्पन्न करना।
  • व्यक्तिगत मित्रता और मेल-मिलापों के द्वारा जाति-पाँति के भेदभाव, वंश, धर्म और प्रांतीयता की संकीर्ण भावनाओं का नाश करना।
  • पूरे वाद-विवाद के बाद भारत में शिक्षित लोगों की सामाजिक समस्याओं के बारे में सम्मितियाँ प्राप्त कर उनका प्रामाणिक संग्रह तैयार करना।
  • उन तरीकों पर विचार कर निर्णय करना, जिनके अनुसार आने वाले बारह महीनों में राजनीतिज्ञ देशहित के लिए कार्य करेंगे।

कांग्रेस के इस प्रथम अधिवेशन में नौ प्रस्ताव स्वीकृत हुए, जिनके द्वारा विभिन्न सुधारों की मांग की गई। प्रथम प्रस्ताव में भारतीय प्रशासन की जाँच के लिए एक रॉयल कमीशन नियुक्त करने तथा दूसरे में केन्द्रीय व प्रांतीय व्यवस्थापिका सभाओं में नामजद सदस्यों के स्थान पर निर्वाचित भारतीय सदस्यों की संख्या बढाने की माँग की गई।

इन प्रस्तावों में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं था, जिस पर पहले से ही विचार-विमर्श न हो रहा हो। विभिन्न प्रांतीय राजनीतिक संस्थाओं ने इन विषयों पर कई बार प्रस्ताव पास किये थे। अधिवेशन की समाप्त पर ह्यूम ने महारानी विक्टोरिया की जय के नारे लगवाये।

इस प्रकार कांग्रेस के जीवन का प्रारंभ इंग्लैण्ड के प्रति भक्ति-भाव रखते हुए आरंभ हुआ। किन्तु इस घटना ने भारतीय राजनीतिक चेतना को एक नवीन और निश्चित मोङ प्रदान कर दिया।

यह राजनीतिक चेतना याचिकाओं तथा स्मरण-पत्रों द्वारा कुछ राजनीतिक अधिकार माँगने की ओर मोङ दी गई। काँग्रेस की स्थापना एक प्रबल और बढती हुई शक्ति के निष्कासन के लिए एक रक्षा-नली के रूप में हुई थी। कांग्रेस के नेता भारत पर अंग्रेजी नियंत्रण को सौभाग्य की बात समझते थे।

इसलिए ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा प्रथम आवश्यकता मानते थे। और भारतीयों के लिए राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति गौण मानते थे।

Reference : http://www.indiaolddays.com

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