अनेकांतवाद एवं स्यादवाद अथवा सप्तभंगीनय

अनेकांतवाद जैन दर्शन का सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार सृष्टि का निर्माण अनेक तत्वों से हुआ है और प्रत्येक तत्व के अनेक गुण हैं। साधारण मनुष्य इन अनेक तत्वों व अनेक गुणों को नहीं जान सकता। मोक्ष प्राप्त ही इन अनेक तत्वों गुणों को जान सकता है। इसे ही अनेकांतवाद कहा गया है।

स्यादवाद या सप्तभंगीनय सिद्धांत-

यह ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है। इसके अनुसार ज्ञान समय, दूरी, प्रकाश, स्थान आदि पर निर्भर करता है। ज्ञान निरपेक्ष नहीं होता वह परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है।

सप्तभंगीनय सिद्धांत के 7 प्रकार के निर्णय-

स्याद् शब्द का अर्थ है – परिस्थिति विशेष में वस्तु से संबंधित ज्ञान की परिस्थितियों पर निर्भर रहने के कारण ज्ञान का स्वरूप परिवर्तनशील हो जाता है, ऐसी स्थिति में लिए गये निर्णय तभी सही होंगे जब निर्णय से पहले स्याद् (एक परिस्थिति विशेष) शब्द जोङा जायेगा। तभी लिखा गया निर्णय सही होगा।

किसी वस्तु के संदर्भ में स्याद् पूर्वक 7 प्रकार के निर्णय लिये जा सकते हैं-

  1. स्याद् है।
  2. स्याद् नहीं है।
  3. स्याद् है और नहीं है।
  4. स्याद् अव्यक्त है।
  5. स्याद् है और स्याद अव्यक्त है।
  6. स्याद् नहीं है और अव्यक्त है।
  7. स्याद् है और नहीं है तथा अव्यक्त है।

Reference : http://www.indiaolddays.com

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